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MCA पास युवा ने नौकरी छोड़ 4 गायों से शुरू किया बिजनेस; आज 'समेकित कृषि प्रणाली' से सालाना छाप रहा 30 लाख रुपये

कृषि मंत्री ने भी किया सलाम! जानिए हरियाणा के इस 'प्रगतिशील किसान' की सफलता का राज, जो कभी नहीं होने देता नुकसान
 
सिरसा के गांव रूपाणा खुर्द के प्रगतिशील किसान सुरेंद्र सुथार अपनी देसी गायों के साथ

आजकल के नौजवान जहां बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करने के बाद सरकारी या प्राइवेट नौकरी के पीछे भागते-भागते अपनी आधी उम्र गुजार देते हैं, वहीं सिरसा जिले के नाथूसरी चोपटा इलाके का रूपाणा खुर्द गांव पूरे हरियाणा के लिए एक नई मिसाल पेश कर रहा है। यहां के रहने वाले सुरेंद्र सुथार ने एमसीए (MCA) जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी की फाइलों में अपना भविष्य नहीं तलाशा, बल्कि अपनी माटी से जुड़कर कुछ बड़ा करने की ठानी। चोपटा प्लस की इस खास रिपोर्ट में हम आपको इस युवा किसान की वह कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने परंपरागत खेती के साथ-साथ 'समेकित कृषि प्रणाली' को अपनाकर न सिर्फ अपनी तकदीर बदली, बल्कि आज वह पूरे इलाके के किसानों के लिए एक चलता-फिरता प्रेरणास्रोत बन गया है।

इस शानदार सफर की शुरुआत करीब पांच साल पहले हुई थी, जब सुरेंद्र ने अपने भाई कलमेंद्र सुथार के साथ मिलकर घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का बीड़ा उठाया। इसके लिए उन्होंने निकटवर्ती राजस्थान के गांवों का दौरा किया और देसी नस्ल की गायों के महत्व को गहराई से समझा। बिना किसी बड़ी सरकारी मदद या लोन के, उन्होंने अपने ही पैसों से शुरुआत में मात्र चार देसी गायें खरीदीं और दूध बेचने का काम शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने साहीवाल, राठी, थारपारकर और हरियाणवी नस्ल की गायों का एक बड़ा कुनबा तैयार कर लिया। आज उनके पास कुल 95 गोवंश हैं, जिनमें 25 दुधारू गायें शामिल हैं। अकेले दूध के इस व्यवसाय से उन्हें हर महीने ढाई लाख रुपये से ज्यादा की आमदनी होती है, जो सालाना करीब 30 लाख रुपये बैठती है। यह सब केवल किस्मत का खेल नहीं, बल्कि उनकी दिन-रात की हाड़-तोड़ मेहनत और लीक से हटकर सोचने का नतीजा है।

सुरेंद्र की असली सफलता का राज उनका खेती करने का तरीका है, जिसे आज की वैज्ञानिक भाषा में 'समेकित कृषि प्रणाली' (Integrated Agriculture System) कहा जाता है। उन्होंने खेती को सिर्फ अनाज उगाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि डेयरी फार्मिंग, बकरी पालन, कड़कनाथ नस्ल का फ्री-रेंज मुर्गी पालन और प्राकृतिक खेती को एक ही धागे में पिरो दिया। यह एक ऐसा जीरो-वेस्ट मॉडल है, जहां एक चीज का कचरा दूसरी चीज के लिए खाद बन जाता है।

उदाहरण के लिए, गायों के गोबर को वे बर्बाद नहीं जाने देते, बल्कि 20 बेड पर 'आइसीनिया फेटिडा' प्रजाति के केंचुओं की मदद से वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) तैयार करते हैं। इस खाद और केंचुओं को बेचकर ही वे हर महीने लगभग 25 हजार रुपये की अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं, जो सालाना डेढ़ लाख रुपये से ऊपर पहुंच जाती है।

खेती में अक्सर किसानों को कभी सूखे की मार झेलनी पड़ती है तो कभी बेमौसम ओलावृष्टि और टिड्डी दलों के हमले से फसल बर्बाद हो जाती है। लेकिन सुरेंद्र का मानना है कि 'समेकित कृषि प्रणाली' किसान को एक ऐसा सुरक्षा कवच देती है कि अगर एक तरफ से नुकसान हो भी जाए, तो पशुपालन और खाद बिक्री से उसकी भरपाई हो जाती है। उनकी इस दूरदर्शी सोच और बहुआयामी आय मॉडल को हाल ही में एक बड़ी पहचान भी मिली है।

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय कृषि विकास मेले में हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने उन्हें 'प्रगतिशील किसान' के सम्मान से नवाजा है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का जो जहर-मुक्त और प्राकृतिक खेती का सपना है, उसे सुरेंद्र सुथार पहले से ही अपनी जमीन पर सच कर रहे हैं। इस सफलता में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) सिरसा के वैज्ञानिकों, विशेषकर डॉ. देवेंद्र झाखड़ के तकनीकी मार्गदर्शन का भी बड़ा हाथ रहा है।

अपने इस व्यवसाय के साथ-साथ सुरेंद्र आज भी एक निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं और युवाओं को स्वरोजगार के प्रति जागरूक कर रहे हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि सरकार को देसी गायों की नस्ल सुधार और संरक्षण पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, ताकि लोग गायों को लावारिस न छोड़ें। इसके साथ ही, उनका सुझाव है कि चोपटा क्षेत्र में दूध भंडारण की एक ठोस व्यवस्था होनी चाहिए और पशुओं को सर्दी-गर्मी से बचाने वाले शेड बनाने के लिए किसानों को आसान किस्तों पर लोन या अनुदान मिलना चाहिए।

अगर किसान पारंपरिक खेती के साथ इस तरह के स्वदेशी तरीकों को जोड़ लें, तो उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सुरेंद्र सुथार का यह कृषि मॉडल साबित करता है कि खेती कोई घाटे का सौदा नहीं है, बशर्ते इसे सही तकनीक और समझदारी के साथ किया जाए।

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