Unhealthy Soil: क्या आपके भी खेत में घटने लगी है पैदावार, आज ही चेक करें खेत की मिट्टी खराब होने के 5 बड़े संकेत
फसल की अच्छी पैदावार सिर्फ अच्छे बीज और खाद पर निर्भर नहीं करती, बल्कि खेत की मिट्टी की सेहत भी उतनी ही अहम होती है। स्वस्थ और उपजाऊ मिट्टी ही टिकाऊ खेती की नींव है। कई दशकों से औद्योगीकरण, शहरीकरण और रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल के चलते मिट्टी की गुणवत्ता लगातार घट रही है। ऐसे में किसानों के लिए यह जानना जरूरी है कि मिट्टी खराब होने के शुरुआती संकेत क्या हैं और समय रहते इसे कैसे सुधारा जा सकता है।
मिट्टी खराब होने के मुख्य संकेत
पौधों की पत्तियों का पीला पड़ना
अगर खेत में पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगें, उनकी बढ़वार रुक जाए या जड़ें कमजोर दिखाई दें, तो यह मिट्टी की खराब सेहत का पहला संकेत है। ऐसी मिट्टी में पौधों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता, जिससे फसल कमजोर पड़ने लगती है और रोगों का खतरा बढ़ जाता है। पौधों का मुरझाना, बढ़वार रुक जाना और पत्तियों का रंग बदलना भी मिट्टी की समस्या के लक्षण हैं।
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मिट्टी की बनावट में बदलाव
स्वस्थ मिट्टी हमेशा भुरभुरी, मुलायम और दानेदार होती है। ऐसी मिट्टी में पानी आसानी से समा जाता है और जड़ों को फैलने की पूरी जगह मिलती है। लेकिन अगर मिट्टी सख्त हो जाए, बड़े-बड़े ढेले बनने लगें या सतह पर कठोर परत दिखाई दे, तो यह साफ संकेत है कि मिट्टी की गुणवत्ता कम हो रही है। खराब मिट्टी में पानी या तो बहुत जल्दी सूख जाता है (पानी रोकने की क्षमता कम) या फिर पानी जमा रहता है (खराब जल निकासी)।
पैदावार में लगातार कमी
अगर बीज, खाद और सिंचाई के बावजूद फसल की पैदावार साल-दर-साल घट रही है, तो इसका मतलब है कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो रही है। यह सबसे आम और साफ संकेत है कि मिट्टी को तुरंत सुधार की जरूरत है।
मिट्टी से बदबू आना
स्वस्थ मिट्टी से सुहानी, मिट्टी जैसी खुशबू आती है। अगर मिट्टी से खट्टी, अंडे जैसी या सड़न की बदबू आ रही है, तो यह खराब जल निकासी, ऑक्सीजन की कमी या मिट्टी के अंदर हानिकारक बैक्टीरिया पनपने का संकेत है।
खरपतवार का बढ़ना
कुछ विशेष प्रकार के खरपतवार मिट्टी की समस्या की तरफ इशारा करते हैं। जैसे- कड़वी घास या गूलर (ragweed, mullein) आमतौर पर कम उर्वरता और पोषक तत्वों की कमी वाली मिट्टी में उगते हैं। सिंहपर्णी (dandelion) का ज्यादा होना ह्यूमस (जैविक कार्बन) की कमी दिखाता है।
मिट्टी खराब होने के प्रमुख कारण
रासायनिक खादों और कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल
बिना मृदा परीक्षण के अंधाधुंध रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल मिट्टी की जैविक गुणवत्ता को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक कीटनाशकों और रसायनों के इस्तेमाल से मिट्टी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
पराली जलाना
खेत में पराली जलाने से मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता और उर्वरा शक्ति दोनों कम हो जाती है।
एक ही फसल बार-बार उगाना (Monocropping)
साल-दर-साल एक ही फसल उगाने से मिट्टी में विशेष पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। फसल चक्र न अपनाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटती है।
जैविक कार्बन की कमी
मिट्टी में जीवाश्म कार्बन (Organic Carbon) की भारी कमी पाई गई है। स्वस्थ मिट्टी में जीवाश्म कार्बन 0.75 प्रतिशत होना चाहिए, लेकिन कई इलाकों में यह 0.50 से भी कम है। इसकी कमी से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, मैग्नीशियम, बोरान जैसे 16 पोषक तत्व कम होने लगते हैं।
भारी मशीनों का इस्तेमाल
खेतों में भारी मशीनरी के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी जम जाती है (soil compaction)। जमी हुई मिट्टी में जड़ें गहराई तक नहीं जा पातीं और हवा-पानी का आवागमन ठीक से नहीं होता।
मिट्टी की सेहत कैसे सुधारें?
मृदा परीक्षण कराएं
हर 3 से 5 साल में मिट्टी की जांच कराना बेहद जरूरी है। मृदा परीक्षण से पता चलता है कि खेत में किस पोषक तत्व की कमी है और कौन-सी खाद कितनी मात्रा में डालनी चाहिए। मिट्टी का नमूना लेने के लिए एक एकड़ में 8-10 जगह से 6 इंच गहराई से मिट्टी लेकर मिला लें और ½ किलो नमूना प्रयोगशाला में भेजें। जिले की मृदा जांच प्रयोगशाला में यह सुविधा निःशुल्क उपलब्ध है।
जैविक खेती को बढ़ावा दें
गोबर की खाद, वर्मी-कम्पोस्ट और हरी खाद जैविक तत्वों के अच्छे स्रोत हैं। रासायनिक खादों के साथ जैविक खाद और बायो-फर्टिलाइजर का संतुलित इस्तेमाल मिट्टी की सेहत के लिए बेहतर होता है।
फसल चक्र अपनाएं
अलग-अलग मौसम में अलग-अलग फसलें उगाएं। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है और कीट-रोगों का खतरा कम होता है।
पराली न जलाएं
पराली को खेत में ही मिला दें या इसका गीली घास (mulch) की तरह इस्तेमाल करें। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है और नमी बनी रहती है।
सिंचाई का सही प्रबंधन करें
जरूरत से ज्यादा पानी न दें। ड्रिप सिंचाई या स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक विधियों से पानी की बचत होती है और मिट्टी की संरचना खराब नहीं होती।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड का उपयोग करें
सरकार द्वारा जारी मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) किसानों को उनकी मिट्टी की गुणवत्ता और पोषक तत्वों की जानकारी देता है। इस कार्ड के आधार पर ही उर्वरक डालने और मिट्टी सुधारने की सलाह लें।
खेत की मिट्टी ही अन्न का आधार है। मिट्टी की सेहत बिगड़ने से न सिर्फ फसल कम होती है, बल्कि अनाज की गुणवत्ता भी घटती है। समय-समय पर मृदा परीक्षण कराएं और जैविक खेती को अपनाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ मिट्टी बचाएं।

