हरियाणा में इन कर्मचारियों को लगने वाला है EPFO का बड़ा झटका, जाने क्या बनेगी वजह
चोपटा: हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों ने मजदूरों के प्रदर्शन के बाद न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की है। अब हरियाणा में अनस्किल्ड मजदूरों की न्यूनतम बेसिक मजदूरी 15,220.71 रुपये प्रति माह हो गई है। इसका सीधा असर ईपीएफओ (EPFO) से जुड़े कर्मचारियों पर पड़ेगा। दरअसल, ईपीएफओ में अनिवार्य योगदान के लिए अभी मूल वेतन की सीमा 15,000 रुपये प्रति माह ही है।
एक अधिकारी ने बताया कि 15,000 रुपये तक की बेसिक सैलरी वाले कर्मचारियों के लिए ईपीएफओ कवरेज अनिवार्य है। अब हरियाणा में न्यूनतम वेतन सीमा 15,000 रुपये से ऊपर हो चुकी है, जिससे कर्मचारियों के लिए ईपीएफओ में योगदान वैकल्पिक (वॉलंटरी) हो गया है। यही नहीं, गाजियाबाद और गौतम बुध नगर में भी 1 अप्रैल 2026 से सेमी-स्किल्ड और स्किल्ड कर्मचारियों की सैलरी 15,000 रुपये से ऊपर हो चुकी है।
क्या है पूरा मामला और किसे होगा सबसे ज्यादा नुकसान?
बता दें कि ईपीएफओ में वेतन सीमा पिछली बार सितंबर 2014 में बढ़ाई गई थी। तब से यह 15,000 रुपये ही है। दूसरी तरफ, देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सेमी-स्किल्ड और स्किल्ड श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 15,000 रुपये से 20,000 रुपये के बीच है। केरल और दिल्ली में तो कुछ श्रेणियों के श्रमिकों का न्यूनतम वेतन लगभग 22,000 रुपये है। ऐसे में इन राज्यों के कई कर्मचारी ईपीएफओ के दायरे से बाहर हो रहे हैं।
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा है कि ईपीएफओ कवरेज अब ज्यादा कमाई वाले श्रमिकों के पक्ष में होता जा रहा है। हरियाणा में न्यूनतम वेतन बढ़ने के बाद कंपनियां श्रमिकों से जुड़े नियमों को टाल सकती हैं, जबकि इन लोगों को सामाजिक सुरक्षा (सोशल सिक्योरिटी) की सबसे ज्यादा जरूरत है। उन्होंने कहा कि ईपीएफओ को अपनी वेतन सीमा बढ़ाकर 22,000 से 25,000 रुपये करने की सख्त जरूरत है।
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प्रोफेसर अमित बसोले ने आगे कहा कि हरियाणा में हालिया बढ़ोतरी के बाद नियोक्ता उन कर्मचारियों के लिए कंप्लायंस को टाल सकते हैं, जिन्हें सामाजिक सुरक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि ईपीएफओ अपनी वेज सीलिंग को लगभग 22,000 से 25,000 रुपये के आसपास संशोधित करे। ऐसा होने पर ही मजदूरी सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर खड़े मजदूर इस सामाजिक सुरक्षा जाल (सोशल सेफ्टी नेट) से अनिवार्य रूप से जुड़ पाएंगे।
लेबर इकनॉमिस्ट के.आर. श्याम सुंदर का कहना है कि न्यूनतम वेतन को लेकर सबसे बड़ी चिंता गैर-अनुपालन (नॉन-कंप्लायंस) की है। ठेकेदार और कंपनियां अक्सर तय न्यूनतम वेतन का भुगतान भी नहीं करते हैं। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वालों के लिए पीएफ एक अनिवार्य सरकारी बचत योजना है। इसमें कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी का 12% योगदान करता है, जबकि कंपनी भी इतना ही योगदान देती है। कंपनी के योगदान में से 8.33% हिस्सा कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) में जाता है और ईपीएफ खाते में जमा राशि पर सरकारी ब्याज मिलता है। वर्तमान में केंद्र सरकार वेज सीलिंग को बढ़ाकर 25,000 रुपये करने पर विचार कर रही है, लेकिन कंपनियों के विरोध के कारण अब तक इसमें प्रगति नहीं हो पाई है। हालांकि, हालिया घटनाक्रम को देखते हुए माना जा रहा है कि सरकार इस योजना पर आगे बढ़ सकती है।
