क्या है चक्का गांव की प्रियंका का सीक्रेट? खारे पानी और रेतीली जमीन में सब्जियों की बंपर पैदावार से कमा रही लाखों

 

सिरसा जिले के चोपटा क्षेत्र के गाँव चक्का की महिला किसान प्रियंका ने वह कर दिखाया जो परम्परागत खेती से थके हुए किसानों के लिए एक नज़ीर बन गई है। जहाँ खेत की ज़मीन पूरी तरह रेतीला टीला है और भूमिगत पानी खारा व लवणीय है उसी ज़मीन पर उन्होंने मात्र एक एकड़ में ऑर्गेनिक सब्जी की खेती शुरू की और पहले ही साल तीन महीनों में 50 हजार रुपये की बचत कर ली। इस बार छह महीनों में सवा से डेढ़ लाख रुपये तक की पैदावार की उम्मीद है।

नरमा, कपास और ग्वार की परम्परागत खेती से परिवार की मूलभूत ज़रूरतें पूरी करना भी मुश्किल होता जा रहा था और कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा था। पति इन्द्रसेन की सहमति से प्रियंका ने परम्परागत खेती से मुँह मोड़ने का साहसिक फैसला लिया।

रेत और खारे पानी को बनाया हथियार — पहले साल ही 50 हजार की बचत

प्रियंका ने बताया कि पहले साल उन्होंने केवल भिंडी और कक्कड़ी लगाई थी। रेतीली मिट्टी और खारे पानी के बावजूद फसल अच्छी हुई और तीन महीने में 50,000 रुपये की शुद्ध बचत हाथ में आई। इस सफलता ने हौसला इतना बढ़ाया कि इस बार उन्होंने मिर्च, भिंडी, टिंडी, कक्कड़ी, लोकी, तोरी और बंगा जैसी कई सब्जियाँ एक साथ लगाई हैं, जिनकी पैदावार शुरू हो चुकी है।

ऑर्गेनिक तरीके से खेती करने के लिए प्रियंका के पति इन्द्रसेन कृषि विभाग रानियां से नियमित मार्गदर्शन लेते हैं। गोबर, गोमूत्र, नीम की पत्तियाँ, छाछ, हल्दी और गुड़ का मिश्रण बनाकर समय-समय पर छिड़काव किया जाता है, जिससे सब्जियाँ पूरी तरह विषमुक्त और शुद्ध ऑर्गेनिक रहती हैं।


खेत से ही बिक जाती है सब्जी — मंडी जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती अक्सर

ऑर्गेनिक और ज़हरमुक्त होने के कारण इनकी सब्जियाँ बाज़ार से थोड़ी महंगी हैं, लेकिन ग्राहक खुद खेत पर आकर सब्जी खरीद ले जाते हैं। इससे न बिचौलिये की ज़रूरत, न यातायात का झंझट। केवल जब पैदावार ज़्यादा होती है तब रानियां, जीवन नगर, ऐलनाबाद या सिरसा सब्जी मंडी में बेचना पड़ता है, जिसमें समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं।

प्रियंका स्वीकार करती हैं कि नई खेती में अनुभव न होने के कारण शुरुआत में दिक्कतें आईं। सब्जियों में लगने वाली बीमारियाँ, पौधों की बढ़वार और मौसमी बदलावों के अनुसार देखरेख पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। समय रहते सही उपाय न हो तो नुकसान भी उठाना पड़ सकता है — यह उनका अपना अनुभव है।

चक्का गाँव की प्रियंका की यह कहानी उन हज़ारों किसानों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण है जो कम ज़मीन, कमज़ोर मिट्टी और सीमित संसाधनों के बावजूद खेती से बेहतर आमदनी की राह तलाश रहे हैं।