Sociology of Religion :पूँजीवाद के उदय की रूपरेखा को चिह्नित करें ।
Sociology of Religion : पूँजीवाद के उदय के साथ-साथ कृषि का महत्त्व घटता रहता है। इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है कि जब सामंतवाद का बोलबाला होता है तो धर्म का महत्त्व बढ़ता है तथा कृषि का महत्व भी, किंतु पूँजीवाद में कृषि और धर्म का महत्त्व कम होना चाहिए अथवा पूँजीवाद में धार्मिक रूढ़िवाद की समाप्ति होनी चाहिए।
Sociology of Religion :मार्क्स ने समाज की अधिसरचना और अधोसंरचना को विभाजित करते हुए व्यक्ति के वर्ग को उसके व्यवहार के संचालन में महत्त्वपूर्ण माना है, इसी प्रकार धर्म भी है।
मार्क्स ने धर्म की समाज में भूमिका स्वीकारते हुए कहा है कि धर्म मानव की पीड़ाग्रस्त मस्तिष्क को शांति प्रदान करने का एक माध्यम है।
वेबर ने इस संदर्भ में धर्म को आर्थिक विकास में सहायक नहीं माना है। मार्क्स भी धर्म को मानवीय क्रियाकलापों को निर्देशित करने वाला नहीं मानते। किंतु मार्क्स ने धर्म को मानव व्यवहार में उपस्थित अवश्य माना है।
फिर भी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में धर्म की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, यह अपने परिवर्तित स्वरूप में सहयोगी अवश्य है।