Sociology of religion: मानवशास्त्रीय उपागम (Anthropological Approaches)
Sociology of religion :ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में जब सामाजिक मानवशास्त्र एक अलग विभाग के रूप में स्थापित किया गया उस समय गैर-पश्चिमी समाजों में धर्म अध्ययनकर्ताओं के लिए एक मुख्य विषय था। समाजशास्त्रों के स्वरूपों में सामाजिक व्यवस्था के अध्ययन को मानवशास्त्रियों द्वारा किए गए विभिन्न मानव संस्थाओं के तुलनात्मक अध्ययन से जाना जा सकता है।
Sociology of religion: इस प्रकार के अध्ययनों में समाज की जानकारी के लिए मानव की उत्पत्ति अथवा सामाजिक संगठन की उत्पत्ति से अद्यतन संरचना तक का ज्ञान आवश्यक है अतः मानव जीवन की विकासात्मक कहानी से ही समाजशास्त्रियों का अध्ययन पूर्ण हो सकता है।
Sociology of religion: इन अध्ययनों का प्राथमिक उद्देश्य सामाजिक संस्थाओं की उत्पत्ति व उद्धविकास का अध्ययन था, साथ ही वे यह पता करना चाहते थे कि उत्तरोत्तर उद्धविकास के पैमाने पर मानव समाजों को कहाँ रखा जा सकता है।
Sociology of religion: मानवशास्त्रीय सिद्धांतों के निर्माण की आरंभ की अवस्था धर्म और नातेदारी की संस्थाओं ने अधिक ध्यान आकर्षित किया क्योंकि आदिम समाजों में केवल इन्हीं संस्थाओं के स्वरूप मिलते थे। अतः धार्मिक संकल्पना अति प्राचीनतम होने के साथ-साथ विश्व की सभी सभ्यताओं में विद्यमान है।
Sociology of religion: एक अज्ञात सत्ता, सर्वशक्तिमान सत्ता की उपस्थिति और समाज की संरचना के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका ने समाजशास्त्रियों के लिए सामाजिक ज्ञान के. संदर्भमें नया आयाम खोला। अतः इस इकाई में मानवशास्त्रीय उपागमों के माध्यम से धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांतों की व्याख्या, धर्म का सांस्कृतिक स्वरूप आदि पर संक्षिप्त चर्चा की गई है।