Sociology of religion : वैबर एवं प्रातीतिक अर्थ का प्रश्न (Weber and the Question of Meaning)
Sociology of religion मैक्स वेबर (1864-1920) के प्रमुख उद्देश्यों में से एक सामाजिक जीवन के आर्थिक पक्ष के अध्ययन के विभिन्न तरीकों को ढूँढ़नां था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने सामाजिक संस्थाओं को दृढ़ता के साथ आर्थिक, आर्थिक रूप से प्रासंगिक अथवा आर्थिक रूप से निर्धारित में भेद किया।
Sociology of religion वेबर ने धर्म के समाजशास्त्र को रेखांकित करने की विविध प्रक्रिया को विधिवत् समझा है। वेबर ने अपने दर्शन में यह दर्शाने का प्रयत्न किया है कि धार्मिक नैतिकता की आर्थिक प्रासंगिकता होती है।
वेबर के अनुसार धर्म की कोई भी स्पष्ट आर्थिक विशेषता नहीं है, तब भी गहनतापूर्वक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उसमें आर्थिक व्यवहार तथा विकास के लिए निश्चित परिणाम की आवश्यकता होती है।
Sociology of religion मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को सामाजिक क्रिया के विस्तृत विज्ञान के रूप में माना है, उनके लिए समाजशास्त्र एक विज्ञान है, जो सामाजिक क्रिया को अर्थपूर्ण ढंग से समझने का प्रयास करता है। मार्क्स का कथन है 'अर्थ की संरचना समाज की संरचना को निर्मित करती है।
Sociology of religion वेबर भी कहीं-न-कहीं अर्थ व समाज के बीच अंतर्संबंध को बेहद सजगता से समझते हैं, अतः इनके परिवर्तन के आयाम की गहराई से दार्शनिक व्याख्या की गई है।
वेबर ने कहा, 'जो यहाँ समझाया गया है। वह संसार में एक मार्ग बनाने के लिए एक सामान्य साधन नहीं है वरन् एक विशिष्ट आचार-विचार है। इस इकाई में वेबर के अनुसार विधि तथा प्रतीतिक अर्थ का वर्णन करने की विधि को समझाया गया है।