हरियाणा में फौजियों के लिए बड़ी खबर, पेंशन को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज
अदालत ने केंद्र सरकार की उस याचिका को सुनवाई के बाद खारिज कर दिया जिसमें आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के साल 2019 के आदेश को चुनौती दी गई थी। एएफटी ने पूर्व में यह व्यवस्था दी थी कि मेडिकल आधार पर सेवा से मुक्त किए गए जवानों को पेंशन का लाभ दिया जाना चाहिए, चाहे उनकी दिव्यांगता का प्रतिशत निर्धारित सीमा से कम ही क्यों न हो। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस आदेश को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि जब किसी जवान की दिव्यांगता का मुख्य कारण उसकी सैन्य सेवा है, तो उसे पेंशन के अधिकार से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।
आंतरिक पत्राचार नहीं बदल सकता कानून
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत सरकार और तीनों सेनाओं के प्रमुखों के बीच होने वाला कोई भी आंतरिक पत्राचार सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित और स्थापित कानूनों को नहीं बदल सकता। न्यायमूर्ति हरसिमरन सिंह सेठी ने फैसला सुनाते हुए कहा, "राज्य इस तथ्य को खंडित करने में असमर्थ रहा कि संबंधित अधिकारी अपनी दिव्यांगता के बावजूद सेवा में बने नहीं रह सकते थे।" बेंच ने यह भी माना कि यदि सेवा से मुक्ति का कारण ऐसी दिव्यांगता है जो ड्यूटी के दौरान पैदा हुई या बढ़ी है, तो संबंधित जवान को दिव्यांगता पेंशन का लाभ मिलना ही चाहिए।
हरियाणा के पूर्व सैनिकों को मिलेगी राहत
इस फैसले का सीधा और सकारात्मक असर हरियाणा और पंजाब के उन पूर्व सैनिकों पर पड़ेगा जो मेडिकल बोर्ड द्वारा अनफिट घोषित होने के बाद घर भेज दिए गए थे। अब तक रक्षा मंत्रालय के नियमों के अनुसार केवल 20 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता वाले कर्मियों को ही विशेष पेंशन दी जाती थी। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि सिरसा, हिसार और रेवाड़ी जैसे सैनिक बहुल जिलों के सैकड़ों पेंशन मामले इसी तकनीकी पेंच के कारण अदालतों में लंबित हैं। अब हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद इन सभी मामलों में जवानों के पक्ष में फैसला आने का रास्ता साफ हो गया है।
सरकार की दलीलों पर कोर्ट का रुख
केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि सैन्य नियमों और मेडिकल गाइडलाइंस के तहत पेंशन के लिए एक निश्चित प्रतिशत का होना अनिवार्य है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को यह कहते हुए नकार दिया कि सेवा की कठिन परिस्थितियों के कारण शरीर को हुई किसी भी क्षति का मुआवजा मिलना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जब जवान को उसकी इच्छा के विरुद्ध मेडिकल आधार पर सेवा से मुक्त किया जाता है, तो दिव्यांगता के प्रतिशत को आधार बनाकर उसे आर्थिक मदद से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने एएफटी के 2019 के उस आदेश को पूरी तरह सही माना जिसमें पेंशन रोकने के फैसले को गलत बताया गया था।
अब रक्षा मंत्रालय को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के इस फैसले के आलोक में पेंशन वितरण की नई रूपरेखा तैयार करनी होगी। आने वाले दिनों में एएफटी के पास लंबित ऐसे सैकड़ों मामलों में शीघ्र निपटारे की उम्मीद बढ़ गई है।