50 लाख की IT की नौकरी छोड़, साड़ियों के कारोबारो को 2.5 लाख से 25 लाख तक पहुंचाने वाली सोनल गुप्ता की सक्सेस स्टोरी
दिल्ली की रहने वाली सोनल गुप्ता ने आईटी सेक्टर में 20 साल तक 50 लाख रुपए के सालाना पैकेज पर काम किया। कंप्यूटर पर बैठकर की जाने वाली इस नौकरी में न तो कोई भागदौड़ थी और न ही बड़ी चुनौतियाँ। लेकिन इतने सालों के बाद भी उन्हें अपने काम से संतुष्टि नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने साड़ियों का कारोबार शुरू करने का फैसला किया और आज यह फैसला उन्हें सफलता की नई ऊँचाइयों पर ले गया है।
कारोबार का मकसद सिर्फ मुनाफा नहीं, विरासत बचाना भी
सोनल गुप्ता के लिए यह कारोबार सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं है। उनका मकसद भारत की पारंपरिक विरासत को विलुप्त होने से बचाना और ग्रामीण स्तर के उन बुनकरों व कारीगरों को रोजगार देना है, जो साड़ियों की बारीकी जानते हैं। सोनल चाहती हैं कि इन कारीगरों को उनकी मेहनत का सही दाम मिले। इसी सोच के साथ उन्होंने 'दर्शकन' (DarshKan) ब्रांड की शुरुआत की।
आज उनका यह ब्रांड देश के 16 राज्यों में फैल चुका है और चार से पाँच हज़ार गाँवों तक पहुँच चुका है। वह सीधे कारीगरों से उनकी मेहनत से तैयार साड़ियाँ खरीदती हैं और फिर उन्हें अपने ब्रांड के माध्यम से विभिन्न प्रदर्शनियों (एक्सपो) में बेचती हैं। इससे होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा सीधे ग्रामीण कारीगरों तक पहुँचता है।
बिजनेस में नुकसान के बाद गाँव जाकर सीखी साड़ियों की बारीकियाँ
शुरुआत में सोनल को साड़ियों की तकनीकी बारीकियों की अधिक समझ नहीं थी। जब ग्राहक आकर विशेष साड़ियों की माँग करते, तो वह समझ नहीं पाती थीं। शुरुआती दौर में उन्हें बिजनेस में नुकसान उठाना पड़ा और तब उन्हें अहसास हुआ कि यह राह इतनी आसान नहीं है।
इसके बाद उन्होंने खुद गाँवों का रुख किया और कारीगरों से मिलकर हर एक साड़ी की बुनाई और उसकी बारीकियों को गहराई से सीखा। पूरी तैयारी के साथ जब वह दोबारा बाजार में उतरीं, तो उनके काम करने का अंदाज पूरी तरह बदल चुका था।
साड़ियों की एक्सपर्ट बनीं सोनल, हर साड़ी की खासियत बताती हैं
आज सोनल गुप्ता साड़ियों की एक्सपर्ट बन चुकी हैं। यदि कोई ग्राहक उनसे मध्य प्रदेश की प्रसिद्ध चंदेरी या नर्मदा बॉर्डर वाली महेश्वरी साड़ी माँगता है, तो वह उसकी पूरी खासियत विस्तार से समझाती हैं। इसके अलावा, ग्राहक चाहे घीचा साड़ी माँगे, इकत साड़ी, काला कॉटन, गुजरात की अजरख या फिर आंध्र प्रदेश की कलमकारी साड़ी, सोनल हर साड़ी के इतिहास और उसकी बुनाई की विशेषता के साथ ग्राहकों को डील करती हैं। इसी विशेषज्ञता के कारण अब ग्राहक उनसे लगातार जुड़ते जा रहे हैं।
दर्शकन ब्रांड के तहत चंदेरी, तांगलिया, पटोला, भुजोड़ी, कोटपाड़, बनारसी सिल्क, जामदानी, बाग प्रिंट, कलमकारी, अजरख और कोटा डोरिया जैसी विभिन्न प्रकार की प्रामाणिक हैंडलूम साड़ियाँ उपलब्ध हैं। यह विविधता ग्राहकों को भारत की समृद्ध विरासत का एक ही स्थान पर अनुभव करने का अवसर देती है।
25 लाख रुपए तक पहुँचा टर्नओवर
सोनल गुप्ता ने बताया कि वर्ष 2024-25 में उनका टर्नओवर 2.5 लाख रुपए था, जो वर्ष 2025-26 में बढ़कर 25 लाख रुपए तक पहुँच गया है। यानी एक साल के भीतर उनके कारोबार में 10 गुना का इज़ाफा हुआ है। अब लोग साड़ियों की खासियत को समझ रहे हैं और उन्हें एक ही छत के नीचे देश भर का बेहतरीन कलेक्शन मिल रहा है।
गाँव के कारीगरों को सही दाम दिलाना है मकसद
सोनल गुप्ता के अनुसार, हैंडलूम और हैंडक्राफ्ट का यह काम भारत की प्राचीन विरासत है। इसे आज भी बुजुर्ग पीढ़ी संभाल रही है, लेकिन नई पीढ़ी पैसों की कमी और परिवार चलाने की दिक्कतों के कारण इस काम से दूर हो रही है। भारत की यह अनमोल कला हमेशा के लिए खत्म न हो जाए, इसीलिए उन्होंने इस ब्रांड को शुरू किया।
वह कारीगरों का माल अच्छी कीमतों पर खरीदकर बाजार में बेचती हैं और मुनाफा उन तक पहुँचाती हैं। दर्शकन ब्रांड सतत विकास और निष्पक्ष व्यापार के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे कारीगरों को उनकी प्रतिभा का उचित मुआवज़ा मिल सके।
हैंडलूम साड़ी खरीदते समय ध्यान रखें ये बातें
हैंडलूम साड़ी खरीदते समय बुनाई की बारीकी, धागे की गुणवत्ता और डिज़ाइन की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए। प्रामाणिक हैंडलूम साड़ियों में पॉवरलूम की तुलना में अधिक बारीक बुनावट होती है। सीधे कारीगरों या विश्वसनीय ब्रांडों से खरीदारी करने से न केवल सही उत्पाद मिलता है, बल्कि ग्रामीण कारीगरों को भी उचित मूल्य मिल पाता है।