अम्बेडकर के अनुसार जाति का खात्मा किस प्रकार किया जा सकता है?

हिंदू धर्म की केवल एक मानक पुस्तक होनी चाहिए जिसे सभी हिंदू स्वीकार करें और मान्यता दें,
 
हिंदुओं में पुरोहिताई समाप्त करना उपयुक्त होगा अन्यथा कम से कम पुरोहिताई अनुवांशिक न हो।

  Chopta plus:  अम्बेडकर के अनुसार जाति एक अवधारणा है, एक मानसिक स्थिति है। यदि कोई जाति व्यवस्था को तोड़‌ना चाहता है तो उसे जाति की पवित्रता और दिव्यता पर प्रहर करना होगा। अम्बेडकर का मानना था कि जाति व्यवस्था को नष्ट करने का वास्तविक तरीका "शास्त्रों की पवित्रता में विश्वास को नष्ट करना है।

इसमें आप सफलता की उम्मीद कैसे का सकते हैं यदि आप शास्त्रों को लोगों की आस्थाओं और मान्यताओं को ढालने की अनुमति दे रहेंगे? शास्त्रों के भत पर प्रश्न न करना, लोगों को शास्त्रों की पवित्रता और उनके नियमों विश्वास करने देना तथा उनके कार्यों को तर्क रहित और अमानवीय कह कर उन्हें दो बताना तथा उनकी आलोचना करना सामाजिक सुधार का उपयुक्त तरीका नहीं है।

अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए कार्य करने वाले महात्मा गाँधी सहित अन्य सुधारक यह नहीं समझते वि लोगों द्वारा किए गए कार्य, शास्त्रो द्वारा उनके दिमाग पर छोड़ी गई मान्यताओं के ही परिणान है और यह कि लोग अपना आचरण नहीं बदलेंगे जब तक वे शास्त्रों की पवित्रता में विश्वार करना नहीं बंद करते जिन पर उनका आचरण आधारित है।

अम्बेडकर ने आगे कहा कि जाति व्यवस्था के दो पक्ष है, यह मनुष्यों को अलग-अल समुदायों में बाँटती है और यह इन समुदायों को एक-दूसरे के ऊपर स्तरों में रखती है। किसी जाति का स्तर जितना अधिक ऊँचा होगा, इसके पास धार्मिक एवं सामाजिक आधार उतने ही अधिक हंगे यह स्तरीकरण जाति व्यवस्था के विरुद्ध किसी वल को संगठित करने को असंभव बना देता है

जातियाँ प्रभुसत्ताओं का ऐसा उच्च तथा निम्न, स्तरित तंत्र बनाती है, जो उनकी प्रस्थितियों से ईर्ष्या  करती है और जो यह जानती है कि यदि सामान्य विघटन हुआ तो उनमें से कुछ अन्य की तुलना अधिक प्रतिष्ठा तथा शक्ति खो देंगी। इसलिए हिंदू को संघटित करना संभव नहीं है।

क्या आप तर्क को चुनौती दे सकते हैं तथा हिंदुओं की जाति को तर्क विरोधी मानक उसे नकारने के लिए कह सकते हैं? यहाँ अम्बेडकर मनु को उद्धृत करते हैं, 'जहाँ तक जारी और वर्ण का संबंध है, न केवल शास्त्र हिंदू को प्रश्न के निर्णय में तर्क का प्रयोग करने के अनुमति नहीं देते बल्कि उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया है कि जाति और वर्ण में उसकी आस्था की आधारशिला को तर्कसगत रूप से जाँचने का कोई अवसर ही शेष न रह जाए।

अम्बेडकर कहते हैं कि यदि कोई जाति व्यवस्था को समाप्त करना चाहता है तो उसे जा व्यवस्था को बदलने के लिए नियम लागू करने होंगे। जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए

वे हिंदू धर्म में निम्नलिखित सुधारों का सुझाव देते हैं:

क) हिंदू धर्म की केवल एक मानक पुस्तक होनी चाहिए जिसे सभी हिंदू स्वीकार करें और मान्यता दें,

(ख) हिंदुओं में पुरोहिताई समाप्त करना उपयुक्त होगा अन्यथा कम से कम पुरोहिताई अनुवांशिक न हो। प्रत्येक व्यक्ति जो स्वयं को हिंदू बताता है पुरोहित के पद के लिए योग्य होना चाहिए। कानून यह सुनिश्चित करे कि कोई हिंदू पुरोहित बनकर धार्मिक कृत्य न करे जब तक उसने सरकार द्वारा निर्धारित परीक्षा न उत्तीर्ण की हो और उसके पास सरकार से इस कार्य को करने की अनुमति होनी चाहिए:

(ग) किसी ऐसे पुरोहित द्वारा किया कोई कार्य वैध नहीं होना चाहिए, जिसके पास उसे करने की अनुमति न हो और बिना अनुमति पुरोहित का कार्य करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाना चाहिए।

(प) पुरोहित सरकार का कर्मचारी होना चाहिए और नैतिकता तथा आस्था के मामले में सरकार द्वारा उस पर अनुशासनिक कार्यवाही करने की छूट होनी चाहिए, और

(छ) पुरोहितों की संख्या सरकार की आवश्यकताओं के अनुसार कानून द्वारा सीमित होनी चाहिए। अम्बेडकर के अनुसार, ये सुधार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व, संक्षेप में, लोकतंत्र पर आधारित एक नई सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का आधार उपलब्ध करवाएँगे।

वर्णों, जातियों और उपजातियों से उत्पन्न शोषणकारी प्रकृति वाली हिंदू सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण करने के बाद, अम्बेडकर, आदर्श सामाजिक व्यवस्था पर अपना दृष्टिकोण बताते हैं। वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित समाज चाहते थे।

बंधुत्व से संगठन और बाँटने के अनुभवों के लिए अधिक मार्ग खुलते हैं। इससे लोगों में अपने साथियों के प्रति आदर और सम्मान का भाव स्थापित करने में मदद मिलती है। अम्बेडकर के अनुसार स्वतंत्रता से लोगों को व्यवसाय चुनने की छूट मिलती है। यह सत्य है कि सभी लोग भौतिक और आर्थिक संपन्नता की दृष्टि से समान नहीं होते हैं।