कवयित्री मीराबाई का जीवन परिचय: एक भक्त कवयित्री का आध्यात्मिक और साहित्यिक योगदान

मीरा के विरुद्ध षड्यंत्रों और प्रताड़नाओं के बावजूद उन्होंने भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा।
 
मीराबाई की कविताएँ राजस्थानी और ब्रजभाषा में रचित होती थीं।

भक्ति आंदोलन की महान कवयित्री मीराबाई का नाम भारत के धार्मिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। मीराबाई केवल एक भक्त नहीं, बल्कि एक ऐसी कवयित्री थीं जिनकी रचनाओं में आत्मिक प्रेम, भक्ति और वैराग्य की तीव्र भावनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। वे भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना पति मानती थीं और उन्हीं के प्रेम में जीवन भर लीन रहीं।

मीराबाई का प्रारंभिक जीवन

मीराबाई का जन्म 1498 ईस्वी में राजस्थान के पाली जिले के कुड़की गांव में एक राजपूत परिवार में हुआ। उनके पिता रतन सिंह राठौड़, दूदा जी के पुत्र थे। बचपन से ही मीरा श्रीकृष्ण की भक्ति में रुचि रखने लगी थीं। कहा जाता है कि उन्होंने बाल्यकाल में ही श्रीकृष्ण की मूर्ति को अपना पति मान लिया था।

विवाह और वैवाहिक जीवन

मीराबाई का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया वंश के राजकुमार भोजराज से हुआ, जो महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही उनके पति युद्ध में घायल हो गए और 1521 में उनकी मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु के बाद उन्हें सती किए जाने का प्रयास किया गया, लेकिन मीरा इसके लिए तैयार नहीं हुईं क्योंकि वे पहले से ही गिरधर गोपाल को अपना पति मान चुकी थीं।

भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर

पति की मृत्यु के बाद मीराबाई पूरी तरह वैराग्य की ओर मुड़ गईं। वे साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करती थीं और कृष्ण मंदिरों में जाकर नृत्य-गान करती थीं। यह बात राजपरिवार को खटकती थी और उन्हें कई बार प्रताड़ना झेलनी पड़ी। एक किंवदंती के अनुसार, उन्हें विष का प्याला तक भेजा गया लेकिन वह चमत्कारिक रूप से निष्प्रभावी रहा।

मीराबाई का सामाजिक संघर्ष

मीरा के विरुद्ध षड्यंत्रों और प्रताड़नाओं के बावजूद उन्होंने भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। जब अत्याचार हद से बढ़ गया तो मीरा मेवाड़ छोड़कर तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ीं और द्वारका तथा वृंदावन जैसे पवित्र स्थलों पर जाकर अपना जीवन बिताया। माना जाता है कि 1547 ईस्वी में वे द्वारका में श्रीकृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं।

साहित्यिक योगदान और काव्य शैली

मीराबाई की कविताएँ राजस्थानी और ब्रजभाषा में रचित होती थीं। उनकी रचनाओं को "मीरा पदावली" कहा जाता है, जिनमें कृष्ण के प्रति गहरा प्रेम और आत्मसमर्पण का भाव होता है। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो", "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई" जैसे भजन शामिल हैं।

हालाँकि मीराबाई के समय की मूल पांडुलिपियाँ उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी 18वीं और 19वीं शताब्दी की कई पांडुलिपियों में उनके भजनों का उल्लेख मिलता है। मीरा की कविताएँ आत्मानुभूति से भरपूर और भक्तिरस में डूबी होती हैं।

मीराबाई की रचनाएं

मीरा की कुछ प्रमुख रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं:

राग गोविंद
गोविंद टीका
राग सोरठा
मीरा की मल्हार
नरसी जी रो माहेरो
गर्वागीत
फुटकर पद

इन रचनाओं में मीरा की कृष्णभक्ति, उनका दर्द, उनकी विरक्ति और आत्मिक प्रेम सभी कुछ देखने को मिलता है।

मीराबाई और सिख साहित्य

भाई बन्नो द्वारा तैयार की गई "भाई बन्नो वली बीर" नामक आदि ग्रंथ की पांडुलिपि में मीराबाई की रचनाएं शामिल की गई थीं। हालाँकि सिख धर्म के मान्य ग्रंथ में उन्हें आधिकारिक रूप से शामिल नहीं किया गया। गुरु गोबिंद सिंह जी के ग्रंथ "प्रेम अंबोध पोथी" में मीरा को सोलह भक्ति संतों में एक के रूप में सम्मानित किया गया है।

मीराबाई एक साधारण स्त्री नहीं थीं, बल्कि वह भारतीय समाज और साहित्य की वह शक्ति थीं जिन्होंने प्रेम, भक्ति और आत्मसमर्पण के माध्यम से भगवान से एकाकार होने का मार्ग दिखाया। वे सामाजिक बंधनों और परंपराओं के विरुद्ध जाकर एक ऐसे समय में अपने विश्वास पर अडिग रहीं जब महिलाओं को स्वतंत्रता का अधिकार नहीं था। मीराबाई आज भी करोड़ों लोगों की श्रद्धा की प्रतीक हैं।