लोहिया के जाति समाप्ति सम्मलेन पर टिपण्णी करें ।
महिलाओं, शूद्रों, हरिजनों, पिछड़ी जातियों, आदिवासियों और मुसलमानों जैसे जुलाहों को 60 प्रतिशत आरक्षण देना होगा।
लोहिया ने 31 मार्च , 2 अप्रैल 1961 को पटना में एक जाति समाप्ति सम्मलेन आयोजित किया और भारत में जाति के उनमलून के लिए निम्न प्रस्ताव पारित किए :
(क) मिश्रित भोज सम्मेलन में भारत के लोगों और इसकी इकाइयों से अपील की गई कि वे देश में सभी जगह विशेषकर गाँवों में मिश्रित भोज पार्टियाँ आयोजित करें।
(८) विवाह सम्मेलन का यह मत था कि जाति व्यवस्था को तभी समाप्त किया जा सकता है जब अंतर्जातीय विवाह आमतौर पर होने लगे। इन विचारों के प्रचार के लिए परिचर्चाओं, नाटकों और मेलों का आयोजन किया जाना चाहिए। सरकार द्वारा अंतर्जातीय विवाले का प्रवर्तन पर्याप्त नहीं होगा। सम्मेलन में यह स्पष्ट था कि यहाँ अंतर्जातीय विवाह का अर्थ उच्च जातियों की विनिग्न उपजातियों के बीच न होकर द्विज और शूद्रों अथवा तैव्ययों और जुलाहों के चीथ विवाह से है।
(ग) सम्मेलन में यह सुझाव दिया गया कि नामों से जुडी उपाधियों को इस तरह बनाना चाहिए कि उससे व्यक्ति की जाति का पता न लगे।
(घ) सम्मेलन में उन लोगों को विशेष अवसर देने के लिए भी एक प्रस्ताव पारित किया गया जिनका हजारों वर्षों से दमन किया जा रहा है, जिससे समाज की पारंपरिक संरचना में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके क्योंकि जाति व्यवस्था के कारण इनकी शक्ति और योग्यता का हास होता है। योग्यता के प्रश्न को ध्यान में रखते हुए सम्मेलन में यह कहा गया कि 'चाहे योग्य हो अथवा नहीं, महिलाओं, शूद्रों, हरिजनों, पिछड़ी जातियों, आदिवासियों और मुसलमानों जैसे जुलाहों को 60 प्रतिशत आरक्षण देना होगा।
सम्मेलन इस बात पर सहमत हो गया कि जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए राजनीतिक कार्यक्रम के साथ धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक कार्यक्रम चलाने होंगे। भूमिरहित निम्न जातियों को भूमि के पुनर्विभाजन अथवा भूमिसेना के माध्यम से घर तथा खेती के लिए भूमि उपलब्ध करवानी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त, "धर्म में से जातियों से सबंधित कचरा भी निकाल फेंकना होगा