ब्राहमणवादी परिप्रेक्ष्य (Brahminical Perspective)पर टिपण्णी।
परिचय
ब्राह्मणवादी परिप्रेक्ष्य हमें धार्मिक ग्रंथों से प्राप्त हुआ है, जो बाह्मणों को उच्च स्थान प्रदान करते हैं। साथ ही साथ अतर्जातीय संबंधों तथा आपसी क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
समाज में ब्राह्मण का स्थान राजा से ऊपर होता है क्योकि ब्राह्मण के पास पूजा-अर्चना व देवताओं को प्रसन्न करने वाली प्रथाओं के द्वारा राजा की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की शक्ति होती है।
बोस के अनुसार बाह्मणों की मिट्टी श्वेत, क्षत्रियों की लाल, वैश्यों की पीली व शूद्र की मिट्टी काली होती है। ऐसा माना जाता था कि प्रत्येक वर्ण भिन्न वर्गों के लोगों में विवाह न करके अपनी शुद्धता और अपने रंग को बचा सकता था।
वास्तव में ब्राह्मण, अपनी स्थिति का वैधीकरण हिंदू धार्मिक ग्रंथों से प्राप्त करते हैं। ये ग्रंथ ब्राह्मणों को उनकी कही हुई बात और उनके सभी कार्यों को एक प्रकार की पवित्रता प्रदान करते है।
जाति पर बाह्मण दृष्टिकोण मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों से लिया गया है। यह उन वरण सिद्धांतों और विचारों पर केंद्रित है जो ब्राह्मणों के आचार तथा प्रथाओं का आदर्श रूप में आधार हेोना चाहिए।
प्रस्तुत इकाई में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि वर्ण-जाति का सिद्धांत क्या है, समाज में ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोपरि मानी गई है. शुद्धता अशुद्धता के सिद्धांत पर भी विस्तार से अध्ययन किया गया है. जो ब्राह्मणों व अन्य जातियों के बीच परस्पर संबंधों पर आधारित है। साथ ही इस इकाई में हम जाति प्रथा पर ब्राह्मणों के दृष्टिकोण, संबंध का आधार, निर्भरता पर चर्चा करेंगे।