पंरपरा की संकल्पना पर टिप्पणी करते हुए बताइए कि क्या परंपरा स्थिर रहती है या बदलती रहती है?
Chopta plus. पंरपरा बुनियादी रूप से व्यवहार भाषा संगीत कला छात्रवृत्ति आदि की शृंखला हैं और जो इस तरह से पिछले कई युगों से विकसित होती आई है। समय के साथ-साथ नजरिए से परंपरा कमोबेश एक नियम बन जाती हैं । जैसे कि पारंपरिक नियम एवं धर्मग्रंथ जो कि हर नजरिए से परंपरा के पहलू है।
ये सामाजिक प्रक्रिया को निरंतरता देते हैं और संबंद्ध समाज के सदस्यों की आने वाली पीढ़ियों को एक परंपरा देते हैं जिसके अपने विशेष गुण होते है इस तरह समाज की निरंतरता भी बनी रहती है। इस तरह परंपरा कुछ जीवंत रचनाओं भंडार है जिसके बिना समाज का कोई अस्तित्व नहीं। इसके अभाव में यह बिखर जाएगी टूट जाएगी जिसका परिणाम होगा कि यह अनियमित बन जाएगी।
परंपरा निम्नलिखित बातों के इर्द-गिर्द घूमती है और इसमें निम्नलिखित बातो समावेश होता है।
विशिष्ट प्रक्रिया या पैतृक संपत्ति
उप परंपराएँ जिनका अपना योगदान होता है
ऐतिहासिक पहलू मौखिक या लिखित
अलौकिक पहलू की निश्चित संकल्पना
संपोषण की आर्थिक संरचनाएँ
देसी कला के पहलू
वास्तुकला के तथ्य
सामाजिक क्षेत्रों में छात्रवृत्ति
साहित्य लिखित एवं अलिखित
प्रौद्योगिकीय संरचनाएँ
आत्म सुरक्षा या अपराध से निपटने में सैन्य शक्ति ।
परपरा समय के साथ मजबूत होती जाती है और इसकी सीमाएँ धीरे-धीरे सुविकसित होती जाती हैं। इसका अर्थ है कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति के आधार परंपरा विकसित या संकुचित होती है। इसके अलावा यह पहले से ही मान लेना गलत हैं , परंपराएँ निरंतर विस्तार की ओर बढ़ती जाती हैं और प्रगति सदैव रैखिक होती है।
यह सत्य है कि इनकी अवनति भी हो सकती है। तीसरी स्थिति उत्पन्न होती है जब परंपरा (entropic) प्रवृत्ति को विकसित कर लेती है और कुछ समय के लिए रुक जाती बाद तेजी पकड़ती है या इसका महत्त्व कम होने लगता है।
अतः परंपरा की शुरुआत होती है जब कोई विशिष्ट कार्य या गतिविधि समाज के लिए जरूरी बन जाती हैं।
इसके आगे अपने उपभाग होते हैं। हालांकि इनमें से कुछ का अध्ययन करना संभव है लेकिन पूर्ण रूप से इनका अध्ययन करने में बहुत वर्षों के शोध की जरूरत है और साकल्यवादी नज रिया पाने के लिए इसके अपेक्षित ऑकडे अभी भी पर्याप्त नहीं हैं।
यहाँ हमारे बताने का आशय है कि किसी भी समाज का ऐसा पूर्ण नजरिया अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है जो कि है। अतः अपने पैतुकों से लोग और समाज जो परंपरा विरासत में प्राप्त करते है. वह विविध स्वरूप में उन्हें उपलब्ध रहती है। विविध पीढियों से जो प्रक्रम चलता आता है वह स्वत परपरा या उप परंपरा बन जाता है।
ऐसे प्रत्येक क्षेत्र में कलाकार एवं वास्तुकार शास्त्रीय प्राचीन एवं परंपरागत कला एवं स्तुकला के विकास के लिए उत्तरदायी रहे है। भारत में ये परंपराएँ शताब्दियों के बाद 1800 में उद्योगीकरण की शुरुआत तक ये पक्का रूप धारण कर चुकी थी।
भारतीय परंपरा वस्तु एवं सेवाओं का विनिमय सेवाओं के भौतिक विनिमय की दृष्टि से शुरू हुआ जिसे जनसाधारण भूपतियों को दिया करते थे। यह परंपरा पद्धति थी और इसने भूमिहीन श्रमिकों का शोषण किया क्योंकि भू स्वामी उन्हें एक तो काम के बदले अपेक्षा से कम समय देते थे कऔर उनसे लंबे समय तक काम करवाते थे।
ऐसा करके इन श्रमिकों को कृषि मौसम की समाप्ति पर मुट्ठी भर अनाज मिल जाता था जिससे उनकी रोजी रोटी चलती रहती थी। ऐसे उदाहरण विश्व भर में देखे जा सकते हैं और सामंतवाद भी इसी तरह एक अन्यायपूर्ण पद्धति की। यह बताना किसी भी बिंदु पर मुश्किल होता है कि परंपराएँ 'अच्छी" हैं या "बुरी"।
यद्यपि भारतीय परंपराओं में कुछ पवित्रता है लेकिन सती और दहेज जैसी परंपरा भी इसी का भाग है। अतः परंपरा की कटाई-छटाई करनी जरूरी हो जाती है ताकि यह गलत दिशा में न बढ़ जाए।
सदियो के बाद ही कोई परंपरा किसी विशिष्ट आस्था और रीति-रिवाजों का विशिष्ट समूह बन जाती है। ये विश्वास एवं रीति-रिवाज किसी एक परंपरा में विशिष्ट होते हैं और इसमें निहित उप-परंपराओं पर भी समान रूप से लागू होते हैं।
इसके बाद परंपराएँ समान सैद्धांतिक विचारधारा को अपने में बाँध लेती हैं और यह बात नैतिक सस्कृति पर भी समान रूप से लागू होती है। तब संस्कृति से क्या आशय है? परंपरा सामाजिक सच्चाई के प्रति एक विशिष्ट उपागम है जो इसे प्रभावित करती है और यह व्यक्ति विशेष और सामाजिक सच्चाई को दिशा प्रदान करती हैं ।
अतः कुछ घुमावदार दशाओं का उल्लेख करने की बजाए अनेकवादी परंपराओं की दृष्टि से बात करना बेहतर होगा क्योंकि देसी दशाएँ एक गलत सोच है क्योंकि सच्चाई पूरी तरह से इसके अंतर्गत आशंकित नहीं होती ।