औचित्य का रस सम्प्रदाय से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
संक्षेप में औचित्य और रस के सम्बन्ध में प्रायः सभी आचार्य एक मत हैं।
May 21, 2025, 11:31 IST
आचार्य क्षेमेन्द्र तो औचित्य के बिना रस की सत्ता हो स्वीकार नहीं करते।
उत्तर- प्रायः सभी सम्प्रदायों के आचायों ने रस के लिए औचित्य को अनिवार्य माना है। आचार्य राजशेवर ने लिखा है कि उचितानुचित के विवेक के बिना रसानुभूति नहीं हो सकती। अभिनव गुप्त ने आनन्दवर्धनाचार्य के मत को पोषण करते हुए औचित्य से रसास्वाद और अनौचित्य से रसाभास माना है।
पण्डित राज जगन्नाथ ने भी लिखा है कि जो बातें अनुचित हैं, उनको काव्य में लाने से वे रस भंग का कारण होती हैं। अतः अनुचित को कभी काव्य में नहीं आने देना चाहिए। आचार्य क्षेमेन्द्र तो औचित्य के बिना रस की सत्ता हो स्वीकार नहीं करते। वे अलंकार और गुणों के लिए भी औचित्य को अनिवार्य मानते हैं।
संक्षेप में औचित्य और रस के सम्बन्ध में प्रायः सभी आचार्य एक मत हैं। सभी को धारणा है कि रस के लिए ही नहीं काव्य के सभी अंगों के लिए औचित्य एक अनिवार्य तत्व है।