Hindi Sahitya: भारतीय धर्मों की बहुव्याख्याओं पर चर्चा करें।
Chopta plus: भारतीय धमों की बहुव्याख्याओं की बात करें तो हिंदू धर्म में हिंदुओं के मूलभूत धार्मिक ग्रंथ चार वेद वैदिक धार्मिक अनुष्वानों और सूत्रों पर आचार्यों की टिप्पणियों व व्याख्याएँ, 108 उपनिषद्, रामायण और महाभारत, 21 पुराण और भारत के अलग-अलग भागों में भक्त संतों ने जो उपदेश दिए उनके संतचरित लेखन संस्कृत भाषा में है। भगवद्गीता में मोक्ष के तीन मार्ग बताए गए हैंः (1) ज्ञान मार्ग (2) कर्म मार्ग, और (3) भक्ति मार्ग।
शताब्दियों से गीता पर अनेकों टीकाएँ लिखी गई और यह काम आज तक जारी है। ये लगभग सभी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी और जर्मनी भाषा में भी उपलब्ध है।
प्रत्येक व्याख्या में कृष्ण द्वारा अर्जुन अ को दिए गए संदेश की व्याख्या को अभिव्यक्त किया गया जो हैं । किसी हिन्दू संप्रदाय का जो भी गुरु गीता पर लिखता या प्रवचन अभिव्यक्त किया गया है।
किसी हिंदू सा है वह उच्च स्थान प्राप्त कर लेता है। इसी तरह, अन्य ग्रंथों की भी विविध व्याख्याएँ की गई है। निस्संदेह, भाषा, प्रदेश और वंशागत सस्कृति में भारतीयों की असीम विविधता का इगाव इन विभिन्न व्याख्याओं और धार्मिक प्रचलनों में दृष्टिगत होता है। विभिन्न संप्रदायों के मली देव अंतहीन विषाद भी इसी स्रोत से उत्पन्न हुए है, अनेक व्याख्याओं और प्रथाओं ने उच्च साहित्यिक
गतिविधि को उद्दीप्त किया है लेकिन इनसे मनमुटाव व संघर्ष भी हुए हैं।
भारत के धर्मों की एक विशिष्ट समस्या है 'मूर्तरूप'। इसका अर्थ है कि चीजों, अर्थों या प्रतीकों को बस्तुओं में परिवर्तित कर दिया गया है। उदाहरण के लिए मनु के समय के हिंदू पुरुष समय-समय पर दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धा भेंट करते थे।
यह प्रथा बाद में मात्र अनुष्ठान इन कर रह गई जिसका कोई प्रतीकात्मक महत्त्व नहीं था, पंडितों ने इस धर्मानुष्ठान का विस्तार कर दिया जो एक आर्थिक बोझ बन कर रह गया। इसी तरह जन्म, विवाह, दाह-संस्कार इत्यादि को धार्मिक रीतियों का रूप देकर उन्हें व्यापक बना दिया, इन रीतियों से लोग कर्जी में डूबने लगे या अर्थवंचना के शिकार बने।
अधिकांश मामलों में प्रतीकात्मक महत्व हिंदुओं की प्रथाओं में गुम हो चुका है। उदाहरण के लिए, एकादशी में धर्मपरायण हिंदू भोजन और जल का सेवन नहीं करते। एकादशी का यौद्रीय भाव केवल व्रत के जरिए पुण्य प्राप्त करना नहीं है। इसका अभिप्राय है अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, अपनी पाँच क्रियाओं तथा अपने मन पर आंतरिक नियंत्रण रखना।
इस नियंत्रण से व्यक्ति भगवान के पास आता है। लेकिन अधिकांश जनसामान्य उपवास को केवल व्रत के रूप में लेते हैं। विना आत्म-निग्रह किए या मनप्रकाश के केवल भोजन ग्रहण न करने से व्यक्ति मूलभूत लक्ष्य से भटक जाता है।
इसी तरह, अन्य समुदाय भी इस मूर्त का शिकार बने हैं। इस्लाम में "जेहाद" का अर्थ है आत्म-निग्रह जिसे व्यक्ति अल्लाह के मार्गदर्शन से प्राप्त करता है। हाल ही की राष्ट्रवादी प्रवृत्ति से इसका अर्थ हो गया है निहत्थे लोगों के विरुद्ध हिंसात्मक गतिविधि की मनोवृद्धि या किसी क्षेत्र को कब्जे में लेना।
इस्लाम में इन व्याख्याओं की मंजूरी नहीं है। जेहाद में केवल आत्म-रक्षा के लिए हिंसा की अनुमति है अर्थात् बाहरी व्यक्तियों द्वारा धर्म पर हमला होता है तय यह वफादारों द्वारा सशस्त्र विरोध करने की अनुमति देता है। ईसाइयों में मूसा के छटे कमांडेंट आपको हत्या नहीं करनी चाहिए केवल मानव जाति की हत्या के संबंध में है।
अत: भोजन के लिए पशुओं को मारा जाता था। यूरोप के अधिकांश भागों में शाकाहार था। संस्थागत प्रचलन शायद मुसा-संहिता के उल्लंघन की क्षतिपूर्ति के लिए है। चालीसे के दौरान 40 दिन तक ईसाई माँस का सेवन नहीं करते थे लेकिन वर्तमान में यह लगभग समाप्त हो चुका है।