उपनिवेशवादी परिप्रेक्ष्य (The Colonial Perspective) का क्या अभिप्राय हैं ?
Chopta plus: जाति परिप्रेक्ष्य के अंतर्गत यह माना जाता है कि जाति को सामाजिक परीक्षण का एक महत्त्वपूर्ण विषय माना जाता है। अतः इसके विभिन्न आयामों की खोज करना अत्यंत आवश्यक है।
आज भारत में जाति विभिन्न रूपों में विद्यमान है। उपनिवेशवादी शासक जाति को बहुत महत्त्व देते थे। इसे समस्त सामाजिक वस्तुओं का मापन माना जाता था। इस काल में जाति को समान, व्यापक तथा सबसे अधिक पूर्ण इकाई माना जाता था।
प्रारंभिक समय में, जाति को व्यक्ति के व्यवसाय से ही जाना जाता था और समाज में उसका सामान्य स्थान ही जाति का संदर्भ था। वैदिक काल से, यह हिंदू सामाजिक संगठन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत रहा है।
इसमें अनेक परिवर्तन हुए हैं और इसके मौजूदा स्वरूप में भारत तथा पाश्चात्य उपनिवेशीय शासन (विशेषकर, अंग्रेज) के बीच हुए धमासान ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जाति के विभक्तिकरण का वर्णन भी इस इकाई में किया गया है, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र आते हैं। जाति शब्द पुर्तगाली तथा स्पेनी भाषा से आया है।
तथा इसका उद्गम लातीनी भाषा के 'कास्ट्स' (शुद्ध पावन) शब्द से हुआ। जाति के प्रजातीय आधार हरबर्ट रिसले के विवरणों में देखने को मिलता है।
जो 1901 में भारतीय जनगणना आयुक्त और दिनिपल ऑफ इंडिया (1908) नामक कालजयी कृति के लेखक थे। रिसले नै जाति को एकनामधारी समूह अथवा परिवारों के समूह के रूप में परिभाषित किया है।
इस इकाई में हग जाति की उत्पत्ति, विकास, उपनिवेशकारी परिप्रेक्ष्य के दृष्टिकोण का विस्तार से, अध्ययन करेंगे। इसके अलावा हम उपनिदेशकों की जाति व्यवस्था की पद्धति, सत्ता, सामाजिक संबंधी पर चर्चा करेंगे।