एकांकी की परिभाषा लिखिए और उसके स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।

एकांकी में एक ही परिस्थिति का निर्माण करना चाहिए तथा विशिष्ट चरित्र या चरित्रों के रेखांकन का प्रयास करना चाहिए।"
 
एकांकी में एक घटना होती है और वह घटना नाटकीय कौशल से कौतूहल का संचय करती हुई चरम सीमा तक पहुँचती है।

उत्तर- एकांकी आधुनिक दृश्य काव्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। प्रसिद्ध नाट्य समीक्षक सिड़नी बाक्स ने एकांकी की परिभाषा देते हुए लिखा है कि "एकांकी में एक विशिष्ट संवेदना को अभिव्यक्त करने का प्रयास करना चाहिए। एकांकी में एक ही परिस्थिति का निर्माण करना चाहिए तथा विशिष्ट चरित्र या चरित्रों के रेखांकन का प्रयास करना चाहिए।"

हिन्दी एकांकी के जनक डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, "एकांकी में एक घटना होती है और वह घटना नाटकीय कौशल से कौतूहल का संचय करती हुई चरम सीमा तक पहुँचती है। उसमें कोई अप्रधान प्रसंग नहीं रहता। विस्तार के अभाव में प्रत्येक घटना कली की भाँति खिलकर पुष्प की भाँति विकसित होती है। उसमें लता के समान फैलने की उच्छृंखलता नहीं होती।"
 

एकांकी का स्वरूप-डॉ. रामकुमार वर्मा ने एकांकी के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है- "एकांकी नाटक में अन्य प्रकार के नाटकों से विशेषता होती है। उसमें एक हो घटना होती है और वह घटना नाटकीय कौशल से कौतूहल का संचय करती हुई चरम सौमा तक पहुँचती है।

पात्र चार या पाँच ही होते हैं, जिनका सम्बन्ध नाटकीय घटना से पूर्णतया सम्बद्ध रहता है। वहाँ केवल मनोरंजन के लिए अनावश्यक पात्र के लिए गुंजायश नहीं रहती। प्रत्येक व्यक्ति की रूपरेखा पत्थर खिंची हुई रेखा के समान स्पष्ट और गहरी होती है। विस्तार के अभाव में प्रत्येक घटना कली की भाँति खिलकर फूल के सदृश्य विकसित हो उठती है।

एकांकी के प्रमुख तत्त्व सात होते हैं- कथावस्तु, दृश्य विधान, चरित्र चित्रण, कथोपकथन, भाषा-शैली, उद्देश्य और अभिनेयता ।

  कथावस्तु -  एकांकी की कथावस्तु किसी एक परिस्थिति, घटना जनित संवेदना को लेकर विकसित होती है। कथावस्तु लघु होती है। कथावस्तु में संघर्ष का होना आवश्यक है। उसमें संकलन त्रय-स्थान, समय और घट्ना में एक्य होना आवश्यक होता है।

दृश्य विधान- एकांकी में एक ही अंक होता है, उसका विभाजन दृश्यों में हो सकता है। दृश्यों में निर्देश आदि का होना आवश्यक होता है।

चरित्र-चित्रण- एकांकी में पात्रों की संख्या सीमित होती है लेकिन उनका चरित्र-चित्रण ऐसा स्पष्ट होना चाहिए कि प्रत्येक पात्र के चारित्रिक गुण पूर्णरूपेण निखर आवें।

कथोपकथन- कथोपकथन या संवाद एकांकी का प्राण होता है। उससे एकांकी में सक्रियता आ जाती है। एकांकी के कथोपकथन संक्षिप्त, औचित्यपूर्ण, व्यंजनात्मक, मनोवैज्ञानिक और देशकाल तथा वातावरण के अनुकूल होने चाहिए।

भाषा शैली- एकांकी की अपनी विशेष शैली होती है। उसमें कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक भावों और विचारों की व्यंजना करनी पड़ती है।