किसान की फसल पर चलता था पूरा गांव: जानिए किस को कितना हिस्सा मिलता था?
पहले के गांव में किसान का योगदान कितना बड़ा था
पुराने समय में जब पैसे का चलन नहीं था, तब भारत के गांवों में हर काम के बदले अनाज दिया जाता था। किसान अकेला अपने परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के पेट पालने का जिम्मेदार होता था। फसल के बाद हर जाति के अपने हिस्से निश्चित होते थे।
अंग्रेजों से पहले और बाद की व्यवस्था
1879 में अंग्रेजों ने भारत में जमीनों का बंदोबस्त किया और गांवों की सीमाएं तय कर दीं। इसके साथ-साथ हर जाति का काम और बदले में मिलने वाला अनाज या सेवा शुल्क भी निर्धारित कर दिया गया। यह नियम हर किसान पर लागू था – चाहे वह जाट हो, अहीर हो, राजपूत हो या कोई और।
फसल में किसको कितना हिस्सा मिलता था?
1. खाती (बढ़ई)
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हल, गाड़ी, चारपाई की मरम्मत
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सामणी में 20 पूली + 10 सेर अनाज
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असाड़ी में 1 जेठ + 20 सेर अनाज
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शादी में ₹1 + भरोटा पूली (खास रोटी)
2. लोहार
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औजारों की धार लगाना, मुरम्मत
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सामणी में 10 पूली + 10 सेर अनाज
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असाड़ी में 1 जेठ + 10 सेर
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शादी पर ₹1 व खेत में भरेटी (विशेष रोटी)
3. नाई
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हजामत, निमंत्रण देना, शादी व रिश्तों में सेवाएं
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सामणी में 10 पूली + 10 सेर अनाज
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असाड़ी में 1 जेठ + 10 सेर
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शादी में ₹5 + 3 दिन तक पूरे परिवार का खाना
4. मनियार (चूड़ीवाला)
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त्योहारों व शादी में चूड़ी पहनाना
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हर फसल पर 5 सेर अनाज
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शादी में 25 पैसे
5. चमार (मोची)
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जूते, बैल का सरोंद, हल की रस्सी बनाना
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फसल में पैर (खलिहान का बचा हुआ अनाज)
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शादी में खान-पान की व्यवस्था
6. धानक (जच्चा-बच्चा सेवा)
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बच्चे के जन्म पर 10 दिन सेवा
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रोज आधा सेर अनाज
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शादी पर सवा गज खद्दर का दुपट्टा
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बदले में किसान से ₹1
7. डीएससी (सफाई कर्मचारी)
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पशुओं का गोबर उठाना, घर की सफाई
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रोजाना एक रोटी
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फसल पर मर्जी से अनाज
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मृत्यु पर सूचना देना
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: क्या सभी किसान इन नियमों का पालन करते थे?
उत्तर: हां, ये नियम सभी किसानों पर लागू थे, चाहे वे किसी भी जाति से हों।
प्रश्न 2: क्या आज भी यह व्यवस्था मौजूद है?
उत्तर: अब यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है, लेकिन कुछ रीतियां जैसे मनियार से चूड़ी पहनाना अब भी देखी जाती हैं।
प्रश्न 3: क्या इस व्यवस्था में शोषण भी होता था?
उत्तर: हां, कई बार किसान अपनी मर्जी से कम अनाज देते थे, जिससे श्रमिक वर्ग को नुकसान होता था।
प्रश्न 4: अंग्रेजों के आने के बाद क्या बदलाव आया?
उत्तर: अंग्रेजों ने जातियों के काम और अधिकार तय किए, लेकिन साथ ही 'बेगार' जैसी शोषणकारी प्रथाएं भी लागू कर दीं।
पुराने ग्रामीण भारत में किसान सिर्फ अपनी फसल नहीं उगाता था, बल्कि पूरी सामाजिक संरचना का पोषण करता था। यह परंपरा आज तो नहीं रही, लेकिन इससे हमें एक मजबूत सामाजिक सहयोग और पारस्परिक जिम्मेदारी की सीख जरूर मिलती है।