आखा तीज पर बाजरे की खिचड़ी क्यों बनती है? — चोपटा के गांवों परंपरागत ढंग से मनाया त्योहार
चोपटा: वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाने वाली अक्षय तृतीया यानी आखा तीज का पर्व रविवार 19 अप्रैल 2026 को राजस्थान की सीमा से सटे चोपटा के पैंतालिसा क्षेत्र के गांवों में श्रद्धा और उल्लास के साथ परंपरागत ढंग से मनाया गया। अक्षय तृतीया पर किए गए सभी शुभ कार्यों का फल कभी खत्म नहीं होता, बल्कि हमेशा बढ़ता रहता है — इसीलिए इस तिथि को 'अक्षय' यानी कभी समाप्त न होने वाला फल देने वाला दिन कहा जाता है। क्षेत्र के गांव कागदाना, कुम्हारिया, खेड़ी, गुसाईं आना, राजपुरा साहनी, गिगोरानी, रामपुरा ढिल्लों, जमाल, कुतियाना, रुपावास, नाथूसरी कलां और लुदेसर सहित सभी गांवों में ग्रामीण महिलाओं ने अपने घरों में बाजरे की खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाया।
ग्रामीण महिला कमला डारा, सीता देवी, शकुंतला और संतोष ने बताया कि आखा तीज का दिन अबूझ मुहूर्त का दिन होता है। भगवान परशुराम का अवतरण भी इसी तिथि को माना जाता है, इसलिए इस दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती है। Amar Ujala क्षेत्र के ग्रामीणों ने पर्व के साथ-साथ भगवान परशुराम को भी नमन किया।
बाजरे की खिचड़ी और हल जोतने की परंपरा — किसान जीवन से जुड़ा है यह पर्व
जब खरीफ की फसल की शुरुआत होने की संभावना होती है, तब पहली बार आखा तीज के दिन किसान खेत में जाते हैं और शुभ शगुन देखते हैं। महिलाएं घर में बाजरे की खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाती हैं और फिर उस दिन सारा परिवार खिचड़ी का भोजन करता है। कमला डारा और सीता देवी ने बताया कि इस दिन किसान नई फसल की बिजाई के लिए हल जोतने की शुरुआत करते हैं और हलधर किसान को घर बुलाकर भोजन कराया जाता है ताकि साल भर खेत में अच्छी फसल हो।
आखा तीज पर राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में पारंपरिक भोजन के रूप में बाजरे की खिचड़ी बनाने की सदियों पुरानी परंपरा है। बाजरा इस क्षेत्र की प्रमुख खरीफ फसल है — और आखा तीज पर बाजरे की खिचड़ी बनाना दरअसल उस फसल के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का तरीका है जो बारिश आने पर खेत में बोई जाएगी। कृषक समुदाय में यह विश्वास है कि इस दिन जो शगुन किसानों को मिलते हैं, वे शत-प्रतिशत सत्य होते हैं, इसलिए किसान इस दिन खेत में जाकर शगुन लेते हैं।
अच्छी बारिश और भरपूर उपज की मांगी कामना — ग्रामीणों की आस्था की मिसाल
पैंतालिसा क्षेत्र के गांवों में इस बार भी ग्रामीण महिलाओं ने घरों में रहकर ही पर्व मनाया। अक्षय तृतीया को राजस्थान और सटे हरियाणा के इलाकों में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है और भरपूर बारिश की कामना की जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि इस दिन भगवान को भोग लगाने और हलधर किसान को भोजन कराने से आने वाले खरीफ सत्र में अच्छी बारिश होती है और फसल की पैदावार भरपूर रहती है।
अक्षय तृतीया पर विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ और नए कार्यों की शुरुआत बिना किसी अलग मुहूर्त के शुभ मानी जाती है। चोपटा के पैंतालिसा क्षेत्र में यह पर्व शहरी चकाचौंध से दूर, खेतों और मिट्टी से जुड़े किसान जीवन की सादगी और आस्था का प्रतीक बनकर हर साल मनाया जाता है — जहां बाजरे की खिचड़ी महज पकवान नहीं, बल्कि धरती से जुड़ाव का भाव है।