मेरा गांव मेरी शानः शहीदों की भूमि के नाम से जाना जाता है सिरसा जिले का गांव लुदेसर, जाने इसका इतिहास और कैसे मिला नाम
वीरों की भूमि लुदेसर: जिस गांव के 5 शेरों ने आजाद हिंद फौज में लड़ी जंग, अब बेटियां भी बन रहीं लेफ्टिनेंट
हरियाणा के सिरसा से महज 25 किलोमीटर दूर बसा लुदेसर गांव, जिसकी मिट्टी में ही देशभक्ति और शहादत महकती है। चौपटा क्षेत्र के इस गांव को सब गर्व से 'वीरों की भूमि' कहते हैं। अगर आबादी की बात करें तो गांव में करीब 3,431 लोग रहते हैं और इस गांव का 3,767 एकड़ का बड़ा रकबा (क्षेत्रफल) है। इस गांव का मुख्य आकर्षण कोई महल या किला नहीं है, बल्कि इसका फौजी इतिहास है। इस गांव के 150 से ज्यादा सपूतों ने देश की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान की है।
लुदेसर गांव का इतिहास
गांव के बड़े बुजुर्ग बताते है कि करीब सौ साल पहले की बात है, राजस्थान के बीकानेर जिले से श्री लाडू राम जी यहां आए थे और उन्होंने ही इस गांव को बसाया था और श्री लाडू राम जी के नाम पर ही शुरू में इस गांव को 'लाडुसर' के नाम से जाना जाता था। फिर हमारी आम बोलचाल में जैसे नाम बदलते हैं, वैसे ही यह समय के साथ लाडुसर से इसका नाम 'लदेसर' हुआ और आज यह 'लुदेसर' के नाम से जाना जाता है।
भौगोलिक स्थिति और पर्यावरण
लोकेशन: लुदेसर गांव हरियाणा के सिरसा जिले के चौपटा खंड का गांव है जो सिरसा से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। यह गांव चौपटा से नोहर रोड़ पर आने वाला सबसे पहला गांव है।
प्राकृतिक संपदा: गांव के पर्यावरण और पानी की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए गांव में बड़ा जलघर औ तीन बड़े जोहड़ (तालाब) मौजूद हैं।
सामाजिक ताना-बाना और जनसांख्यिकी
आबादी और समुदाय: गांव में 2,447 पक्के वोट हैं। यहां मुख्य रूप से गाट, गोदारा, जाखड़, सहारण, सिहाग, माकड़ और साहू गोत्र के लोग रहते हैं। इन सभी समुदायों और गोत्रों के बीच गजब का प्रेम और सौहार्द है। पूरा गांव एक परिवार की तरह रहता है और युवाओं में देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा है।
ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल
ऐतिहासिक धरोहर: गांव के बिल्कुल बीचों-बीच एक ऐतिहासिक 'शहीद स्मारक' (वार मेमोरियल) शान से खड़ा है। इसे अंग्रेजों ने 1921 में बनवाया था और इसके पत्थरों पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के शहीदों के नाम खुदे हैं। जो इस गांव की सबसे बड़ी पहचान है
धार्मिक स्थल: धार्मिक और सामाजिक सेवा के लिए यहां 'श्री कृष्ण प्रणामी गौशाला व नंदीशाला' है। इसके प्रधान शंकर सिहाग हैं और यहां करीब 350 बेसहारा गोवंश की बहुत अच्छे से देखभाल की जाती है।
अर्थव्यवस्था और आजीविका
इस गांव से 3 गांवों की सीमा लगती है जो रुपाणा, रुपावास, हंजीरा है। अगर हम बात करें गांव में व्यवसाय की तो गांव का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है। लेकिन 1995 के बाद यहां की जमीनों सेम आनी शुरू हो गई और मौजूदा समय में यहां 500 से ज्यादा एकड़ में सेम फैल चूकी है जिसके कारण उपजाऊ भूमि बंजर बन चूकी है। जो बची हुई भूमि है यहां किसान गेहूं, जो, बाजरा, सरसों, नरमा आदि की फसले बोते है। यहां कुछ प्रगतिशील किसान भी है जो पारंपरिक खेती के साथ-साथ सब्जि की खेती भी करते है।
कला, संस्कृति और उत्सव
(दी गई सामग्री में गांव के विशेष मेलों, पुरानी परंपराओं या वेशभूषा का जिक्र नहीं है, इसलिए इसे खाली रखा गया है)।
देश सेवा और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
यह इस गांव की कहानी का सबसे बड़ा और गौरवशाली हिस्सा है:
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1919) के समय गांव की कुल आबादी केवल 400 थी, लेकिन उस समय भी गांव के 42 नौजवान सेना में भर्ती थे। इस महायुद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना की तरफ से लड़ते हुए गांव के 2 जवान शहीद हो गए। उनकी बहादुरी से खुश होकर ब्रिटिश सरकार ने 1921 में गांव में एक वार मेमोरियल (शहीद स्मारक) बनवाया और पूरे गांव का 10 साल का टैक्स (आबियाना) माफ कर दिया।
दूसरे विश्व युद्ध (1939-1945) में भी लुदेसर के वीरों ने कदम पीछे नहीं हटाए। इस युद्ध में गांव के 101 वीर पुरुषों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 11 जवान शहीद हुए। इसके बाद स्मारक पर हिंदी में एक और शिलालेख लगाया गया। अंग्रेजों ने जवानों की बहादुरी का सम्मान करते हुए गांव में कुआं बनवाने के लिए उस समय 5 हजार रुपये की राशि दी और एक डाकघर भी खोला।
देश को आजादी दिलाने में भी लुदेसर का अहम योगदान रहा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 'इंडियन नेशनल आर्मी' (आजाद हिंद फौज) में इस गांव के पांच शेर शामिल हुए थे। इनमें हवलदार बाला राम (गाट), मोमन राम, बद्री प्रसाद, तुलसी स्वामी और राम कृष्ण का नाम शामिल है। इन स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की जंग लड़ते हुए विदेशों में जेल भी काटी। अकेले एक गांव से पांच स्वतंत्रता सेनानियों का होना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है।
आजादी के बाद हुए युद्धों में भी लुदेसर ने अपने बेटे देश के नाम किए। 1962 के भारत-चीन युद्ध में गांव के 47 जवानों ने मोर्चे पर डटकर दुश्मनों का सामना किया। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में गांव के 36 सैनिक लड़ने गए थे। इसी युद्ध में गांव के नायक रिसालदार विजय सिंह ने अद्भुत बहादुरी दिखाते हुए अपनी छाती पर बम बांधा और पाकिस्तानी टैंक के आगे कूद गए। उन्होंने टैंक को नष्ट कर दिया और देश के लिए शहादत पाई। इसके बाद 1971 के युद्ध में भी गांव के 20 जवानों ने दुश्मनों के दांत खट्टे किए।
आज इस गांव ने देश को कर्नल सुभाष चंद्र, कैप्टन अनंत सिंह, कैप्टन कुशल सिंह, लेख रामी और कैप्टन महेंद्र सिंह जैसे कई बड़े सैन्य अधिकारी दिए हैं।
देशभक्ति का यह जज्बा अब केवल बेटों तक सीमित नहीं है। गांव के ही निवासी बिजेंद्र सिंह के परिवार की तीन पीढ़ियों ने सेना में सेवाएं दीं और अब उनकी बेटी रेणु बाला लेफ्टिनेंट के पद पर सेना में अधिकारी बनकर गांव का नाम रोशन कर रही हैं।
शिक्षा और आधुनिक विकास
पुराने समय में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने जवानों की बहादुरी से खुश होकर गांव में कुआं बनवाने के लिए 5 हजार रुपये दिए थे और एक डाकघर भी खोला था। आज के आधुनिक विकास की बात करें तो गांव में राजकीय उच्च विद्यालय (Government High School), पशुओं का अस्पताल, जल घर, इलाज के लिए हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर और बच्चों के पढ़ने के लिए एक शानदार लाइब्रेरी मौजूद है।
वर्तमान चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं
वर्तमान में गांव में सबसे बड़ी समस्या खेतों में बढ रही सेम की है। चौपटा क्षेत्र के 23 गांवों में सेम की मार है जिससे उपजाऊ भूमि बंजर होती जा रही है। इसके स्थाई समाधान के लिए सभी गांव के लोगों ने प्रशासन को कई बार अवगत करवाया है, लेकिन अभी तक इसका कोई हल नहीं निकल रहा। ऐसे गांव में कई परिवारों के खाने तक के लाले पड़ गए है। मजबूर होकर अच्छी जमीनो के मालिक भी मजदूरी करने पर मजबूर हो गए है। अगर जल्द ही इस सेम का समधान नहीं किया तो चौपटा के आस-पास के गांवों की जमीन पूरी तरह बंजर हो जाएगी।