संत हरिश्चंद्र ने बदल दी चौपटा की तस्वीर, गांव के कुएं से लेकर स्कूल और ITI तक विकास में रहा अहम योगदान

 

Nathusari Chopta History। नाथूसरी चोपटा क्षेत्र में आज तहसील कार्यालय, बीडीपीओ कार्यालय, पुलिस थाना, आईटीआई, सरकारी और निजी स्कूल, अनाज मंडी और बस स्टैंड जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। लेकिन इस विकास की नींव एक ऐसे शख्स ने रखी, जिसकी आंखों की रोशनी दो साल की उम्र में ही चली गई थी। यह कहानी है संत हरिश्चंद्र की, जिन्होंने एक झोपड़ी से शुरू करके इस इलाके को कस्बे का रूप दिया।

दो साल की उम्र में चेचक ने छीन ली थी रोशनी

स्थानीय लोगों और गद्दी आसीन संत पूर्ण दास महाराज के मुताबिक, संत हरिश्चंद्र का जन्म दिसंबर 1923 में गांव रायपुरिया में रामजस के घर माता माम कोरी की कोख से हुआ था। महज दो साल की उम्र में चेचक की बीमारी ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। करीब 20 साल की उम्र में उन्होंने उदासीन पंथ की दीक्षा ली और साधु जीवन अपना लिया।

ठाकुर मंदिर और कुएं से शुरू हुआ विकास का सफर

संत हरिश्चंद्र ने सबसे पहले गांव में ठाकुर मंदिर का निर्माण करवाया। उस दौर में गांव में पीने के पानी की भारी किल्लत थी। उन्होंने गांव में कुआं खुदवाकर लोगों की पानी की समस्या दूर करने में अहम भूमिका निभाई। उस जमाने में ग्रामीण इलाकों में कुआं सिर्फ पानी का जरिया नहीं होता था, बल्कि पूरे गांव के सामाजिक जीवन का केंद्र भी होता था।

चौधरी देवीलाल से थी घनिष्ठ मित्रता

संत हरिश्चंद्र की हरियाणा के पूर्व उपप्रधानमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल के साथ घनिष्ठ मित्रता थी। इस रिश्ते का फायदा चोपटा क्षेत्र को खूब मिला। संत हरिश्चंद्र ने चौधरी देवीलाल से क्षेत्र के विकास के लिए कई मांगें रखीं।

कैसे बना चोपटा में आईटीआई और स्कूल?

स्थानीय इतिहास के मुताबिक, संत हरिश्चंद्र के प्रयासों का ही नतीजा था कि चोपटा में राजकीय उच्च विद्यालय और साल 1978 में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) की स्थापना हुई। हालांकि, कुछ स्रोतों में आईटीआई की स्थापना 1969 बताई गई है, लेकिन स्थानीय लोग 1978 को ही इसकी स्थापना का साल मानते हैं। आईटीआई ने आसपास के गांवों के नौजवानों को तकनीकी शिक्षा के नए मौके दिए।

दृष्टिबाधितों के लिए बनवाया अंध विद्यालय

संत हरिश्चंद्र ने सिर्फ आम लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि दृष्टिबाधित लोगों के लिए भी काम किया। उन्हीं के प्रयासों से इलाके में अंध विद्यालय की स्थापना हुई, जहां दृष्टिबाधित लोगों को चारपाई और कुर्सी बनाने जैसे हुनर सिखाए गए। यह पहल उस दौर में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जाती थी।

शिव मंदिर और धर्मशाला का निर्माण भी कराया

संत हरिश्चंद्र के काम सिर्फ चोपटा गांव तक सीमित नहीं रहे। नाथूसरी कलां के समाजसेवी रामजस कासनियां ने करीब दो एकड़ जमीन दान में दी, जिस पर शिव मंदिर और भव्य धर्मशाला का निर्माण करवाया गया। इसके अलावा, इलाके के कई गांवों में सत्संग चबूतरे भी बनवाए गए।

1998 में मिला समाजसेवा का पुरस्कार

संत हरिश्चंद्र के समाजसेवा के कामों को देखते हुए साल 1998 में उन्हें पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। इन कामों को अंजाम देने के लिए उन्होंने 'संत समाज सेवा समिति' नाम की संस्था बनाई और जिले में पैदल घूम-घूमकर समाजसेवा के लिए चंदा इकट्ठा किया।

2002 में 80 साल की उम्र में छोड़ा शरीर

साल 2002 में करीब 80 साल की उम्र में संत हरिश्चंद्र ने देह त्याग दी। लेकिन उनके बनाए संस्थान और उनकी समाजसेवा की मिसाल आज भी उस इलाके में जिंदा है।

पुण्यतिथि पर संत सम्मेलन का आयोजन

हर साल 18 दिसंबर को संत हरिश्चंद्र की पुण्यतिथि पर शिव मंदिर धर्मशाला में संत सम्मेलन आयोजित किया जाता है। इस मौके पर हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश समेत देशभर से सैकड़ों संत और श्रद्धालु आते हैं। कार्यक्रम में जागरण, हवन और भंडारे का आयोजन होता है। 2025 में आयोजित 23वीं पुण्यतिथि पर करीब 700 संत-महात्माओं ने शिरकत की थी।

52 गांवों को मिल रही सुविधाएं

एक छोटी सी झोपड़ी से शुरू हुआ चोपटा आज बड़े कस्बे के रूप में विकसित हो चुका है। यहां तहसील, बीडीपीओ कार्यालय, पुलिस थाना, आईटीआई, सरकारी और तीन निजी स्कूल, अनाज मंडी और बस स्टैंड जैसी सुविधाएं हैं। इन सुविधाओं का फायदा इलाके के करीब 52 गांवों के लोगों को मिल रहा है।

संत हरिश्चंद्र का जीवन इस बात की मिसाल है कि शारीरिक अक्षमता के बावजूद अगर इरादे मजबूत हों और समाज के लिए कुछ करने की ठान ली जाए, तो बड़े से बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।