सिरसा के 37 गांवों में ट्यूबवेल के पानी में सोडियम और काला शोरा बढ़ने से बंजर हो रही जमीन, देखें गांवों की लिस्ट
सिरसा जिले के 37 गांवों के ट्यूबवेलों के पानी में निर्धारित सीमा से अधिक सोडियम (काला शोरा) पाया गया है। कृषि विभाग की जांच में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होगी और खेत धीरे-धीरे बंजर हो सकते हैं।
सिंचाई के पानी में कितना होना चाहिए सोडियम का स्तर
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सिंचाई के पानी में सोडियम (काला शोरा) का स्तर सामान्यतः 2.5 तक होना चाहिए। इससे अधिक मात्रा मिलने पर मिट्टी कठोर होने लगती है, जल निकासी प्रभावित होती है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते। शोध अध्ययनों में पाया गया है कि आरएससी (Residual Sodium Carbonate) का मान 2.5 से 4.5 के बीच होने पर सिंचाई के लिए मध्यम से गंभीर प्रतिबंध लागू हो जाते हैं।
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काला शोरा क्या है और यह कैसे नुकसान पहुंचाता है
काला शोरा को सोडियम कार्बोनेट भी कहा जाता है। जब ट्यूबवेल के पानी में सोडियम की मात्रा बढ़ जाती है तो यह मिट्टी में जमा होने लगता है। इससे मिट्टी की भौतिक और रासायनिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मिट्टी में काले शोरे (सोडियम कार्बोनेट) और सफेद शोरे (कैल्शियम कार्बोनेट) की अधिकता से जमीन का पीएच बढ़ जाता है, जिससे फसलों की जड़ें सही से विकसित नहीं हो पातीं।
कृषि विभाग ने क्या कार्रवाई शुरू की
कृषि विभाग जिले में आधुनिक प्रयोगशालाओं के माध्यम से मिट्टी और पानी के नमूनों की जांच कर रहा है। जांच रिपोर्ट ऑनलाइन उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे किसानों को समय पर जानकारी मिल सके। विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे समय-समय पर अपने खेतों की मिट्टी और सिंचाई के पानी की जांच कराएं। संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करें और विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार सुधारात्मक उपाय अपनाएं।
विभाग ने प्रदेश के सभी जिलों से ट्यूबवेलों और सिंचाई के पानी की जांच संबंधी रिपोर्ट भी मांगी है। साथ ही बिजली निगम और संबंधित विभागों के सहयोग से जरूरत पड़ने पर प्रभावित क्षेत्रों में ट्यूबवेलों का सर्वे और सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सिरसा के भूजल की गुणवत्ता पर पहले भी उठे सवाल
सिरसा जिले में भूजल की गुणवत्ता को लेकर पहले भी कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। एक शोध के अनुसार नाथूसरी चोपटा ब्लॉक में 62.3 प्रतिशत पानी सबसे खराब (हाई एसएआर सैलाइन) श्रेणी में पाया गया था। वहीं एलेनाबाद ब्लॉक में 25.7 प्रतिशत पानी अच्छी श्रेणी में मिला था। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि सिरसा जिले में 29.1 प्रतिशत भूजल अच्छा था, जबकि बाकी को उचित प्रबंधन की आवश्यकता थी।
हरियाणा के भिवानी, हिसार और सिरसा जिलों में सिंचाई के लिए मामूली से खारे पानी की समस्या बनी हुई है। नाथूसरी चोपटा ब्लॉक में पानी की गुणवत्ता विशेष रूप से चिंताजनक है, जहां अधिकांश क्षेत्र जलभराव और मिट्टी की लवणता से प्रभावित है।
किसान कैसे करें मिट्टी और पानी की जांच
कृषि विज्ञान केंद्रों में ट्यूबवेल के पानी की निशुल्क जांच की जाती है। किसान अपने खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर नजदीकी कृषि विभाग कार्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र में जांच करा सकते हैं। मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट को समझना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि इससे फसलों के चयन और उर्वरक प्रबंधन में मदद मिलती है।
मिट्टी में काले शोरे की समस्या से कैसे निपटें
जिन खेतों में सोडियम, कार्बोनेट या बायोकार्बोनेट की मात्रा अधिक है, वहां जिप्सम का उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा मैग्नीशियम क्लोराइड का भी उपयोग काले और सफेद शोरे की समस्या के समाधान के लिए किया जाता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि बिना मिट्टी जांच के कोई भी रासायनिक उपाय न करें।
प्रभावित गांवों की सूची
कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार जिले के 37 गांवों के ट्यूबवेलों के पानी में सोडियम (काला शोरा) की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इन गांवों में केलनिया, मल्लेकां, रसूलपुर, मुसाहिबवाला, नानकपुर, टेकरेवाला, मत्तड़, मंगाला, जोधकां, हिंगा, भंगू, सलारपुर, कानसर, शेरशाह वाली, गोरीवाला, खैरां, फग्गू, बेगू, रंगड़ी, खारियां, झोरड़रोही, अलीकां, गोदिकां, फिरोजाबाद, शक्करमंदौरी, भावदीन, अमृतसर खुर्द, भीमा, उम्मेदपुर, चौटाला, बाजेकां, ऐलनाबाद, खैरेकां, गोबिंदपुरा और नानकपुरा शामिल हैं।
लगातार खारे पानी से सिंचाई करने पर क्या होगा
लगातार खारे पानी से सिंचाई करने पर मिट्टी में लवण की मात्रा बढ़ती जाती है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कमजोर पड़ती है और फसलों की पैदावार घटने लगती है। गंभीर स्थिति में खेत पूरी तरह बंजर हो सकते हैं। काला शोरा की मार से कई गांवों में पहले ही बड़ी मात्रा में भूमि बंजर हो चुकी है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके अपनाकर और नियमित निगरानी से इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में अधिक सोडियम पाया गया है, वहां वैकल्पिक सिंचाई स्रोतों और मिट्टी सुधार की तकनीकों पर जोर देने की जरूरत है।