Haryana Special Vyanjan: गुलगुला, सुहाली और मालपुड़ा: लुप्त होता हमारा खानपान, बिगड़ता स्वास्थ्य और अनजान होती युवा पीढ़ी
कभी हमारे घरों की रसोई से उठने वाली गुड़, सौंफ और देसी घी की सोंधी खुशबू पूरे आंगन को महका दिया करती थी। गुलगुला, सुहाली और मालपुड़ा जैसे पारंपरिक व्यंजन केवल खाने की चीजें नहीं थे, बल्कि हमारी संस्कृति, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपराओं की पहचान हुआ करते थे। आज हालात यह हैं कि नई पीढ़ी इन व्यंजनों के नाम तक से अनजान होती जा रही है।
जब रसोई से झलकती थी संस्कृति
एक समय था जब गांवों में बुजुर्ग महिलाएं बड़े प्रेम, धैर्य और अनुभव से ये पारंपरिक व्यंजन बनाया करती थीं। त्योहार हो, मेहमान आए हों या सामान्य दिन—गुलगुला और सुहाली घर की शान माने जाते थे।
आज भी कुछ घरों में बुजुर्ग महिलाएं इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। उनके हाथों बने इन व्यंजनों में स्वाद के साथ-साथ ममता, अनुभव और संस्कार घुले होते हैं, जो बाजार के खाने में कभी नहीं मिल सकते।
सफर का सच्चा और भरोसेमंद साथी
पुराने समय में जब लोग लंबी यात्राओं पर निकलते थे, तो साथ में गुलगुला और सुहाली जरूर रखते थे। ये कई दिनों तक खराब नहीं होते थे, इसलिए होटल या ढाबों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती थी।
यह भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता, सादगी और देसी जीवनशैली का प्रतीक भी था।
स्वास्थ्य का देसी खजाना
गुड़ और सौंफ से बने ये व्यंजन पाचन क्रिया को मजबूत करते थे, शरीर को भरपूर ऊर्जा देते थे और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते थे।
न कोई केमिकल, न कोई प्रिज़रवेटिव—पूरी तरह शुद्ध, देसी और स्वास्थ्यवर्धक। जब घर में गुलगुला या मालपुड़ा बनता था, तो उसकी मीठी खुशबू से पूरा घर और आंगन महक उठता था।
फास्ट फूड में उलझती नई पीढ़ी
आज की युवा पीढ़ी बाजार के फास्ट फूड, पैकेट वाले स्नैक्स और जंक फूड में इतनी उलझ गई है कि अपने पारंपरिक खानपान से दूर होती जा रही है।
इसका नतीजा हमारे सामने है—कम उम्र में ही पाचन संबंधी समस्याएं, मोटापा, थकान और कमजोर इम्युनिटी। स्वाद के नाम पर सेहत से समझौता किया जा रहा है।
बुजुर्गों की चिंता और चेतावनी
गांव की महिला एवं पूर्व पंचायत समिति सदस्य अनीता ढाका (50 वर्ष, बी.कॉम) कहती हैं,
“हमारे समय में गुलगुला-सुहाली खाकर ही पूरा दिन निकल जाता था। पेट भी ठीक रहता था और शरीर में ताकत भी रहती थी। आज के बच्चे बर्गर-पिज्जा जानते हैं, लेकिन अपने घर का खाना नहीं। अगर हमने इन्हें अपनी परंपराएं नहीं सिखाईं, तो आने वाली पीढ़ी इन स्वादों को सिर्फ किताबों में ही पढ़ेगी।”
सावन, परंपराएं और रिश्तों की मिठास
खासकर सावन के महीने में, जब बरसात का मौसम होता था, इन व्यंजनों का अलग ही महत्व हुआ करता था। आज भी कुछ घरों में शनिवार को सरसों के तेल को जलाने की परंपरा के तहत गुलगुला-सुहाली बनाई जाती है।
जब लड़कियों की ससुराल में कोथली भेजी जाती थी, तब उसमें ये पारंपरिक व्यंजन जरूर शामिल होते थे। लेकिन समय के साथ इनकी जगह बाजार की मिठाइयों ने ले ली है।
अब समय है जागने का
आज जरूरत है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को पुराने दौर के खान-पान से परिचित कराएं। यह केवल स्वाद की बात नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, संस्कृति और पहचान को बचाने की जिम्मेदारी भी है।
अगर आज हमने ध्यान नहीं दिया, तो गुलगुला, सुहाली और मालपुड़ा जैसे व्यंजन केवल यादों में सिमटकर रह जाएंगे और हमारी थाली से हमारी विरासत हमेशा के लिए गायब हो जाएगी।