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आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की सौष्ठववादी आलोचना पद्धति की विशेषताओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

आचार्य वाजपेयी ने काव्य में सौन्दर्य का अनुसंधान और जीवन-चेतना का आग्रह किया है।
 
द्विवेदीजी के भाषा-संस्कार का महत्त्व स्वीकार करते हुए भी साहित्य को उन्होंने साधारण कोटि का ही माना।

उत्तर- आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने शुक्लजी द्वारा छायावाद का समुचित मूल्यांकन न किये जाने पर छायावाद-समर्थक आलोचना साहित्य की रचना की। छायावाद की नवीन कल्पनां-सृष्टि, भाषा तथा भाव रूपों के सौन्दर्य का उन्होंने उद्घाटन किया।

मध्यकालीन संस्कारों से युक्त साकेत की समीक्षा उन्हें अनुचित प्रतीत हुई। द्विवेदीजी के भाषा-संस्कार का महत्त्व स्वीकार करते हुए भी साहित्य को उन्होंने साधारण कोटि का ही माना। प्रेमचन्द के आदर्शवाद की भी उन्होंने अधिक प्रशंसा नहीं की। सन् 1941 में उनके आलोचनात्मक लेख 'भारत' में तेजस्विता, प्रखरता और पैनेपन के साथ प्रकाशित हुए। 

 धीरे-धीरे उनमें गंभीरता और संतुलन आया। उनके आलोचनात्मक ग्रन्थ हैं-आधुनिक साहित्य, नया साहित्यः नये प्रश्न, कवि निराला, प्रकीर्णिका, राष्ट्रीय साहित्य तथा अन्य निबन्ध हैं जिनमें वे पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं।

आचार्य वाजपेयी ने काव्य में सौन्दर्य का अनुसंधान और जीवन-चेतना का आग्रह किया है। कथा और नाटक में वे सामाजिक प्रभाव और जीवन-चेतना की तलाश करते हैं। उन्होंने जैनेन्द्र के कथा-साहित्य और अश्क के नाटकों का विवेचन इसी दृष्टि से किया है।

उन्होंने प्रसाद के नाटकों को स्वच्छन्दतावादी और लक्ष्मी नारायण मिश्र के नाटकों को पुनरुत्थानवादी कहकर मौलिक आलोचना दृष्टि का परिचय दिया। उन्होंने रस का खण्डन न करके भी रसवाद को आधुनिक आलोचना में बहुत उपयोगी नहीं माना है।

निराला के काव्य में उन्होंने बुद्धि-तत्त्व और अभिधात्मक शैली को स्वीकार किया है। भाषा के सम्बन्ध में वाजपेयी के विचार है- काव्य के दोनों पक्षों का कवि की संवेदना और उसकी अभिव्यक्ति का समन्वित विवेचन हो काव्य-समीक्षा के लिए उपादेय हो सकता है। काव्य समीक्षा में उन्होंने भाव तथा रूपात्मक सौन्दर्य पर अधिक ध्यान दिया है। उन्हें छायावादी,स्वच्छन्दतावादी, सौष्ठववादी, रसवादी, अध्यात्मवादी आलोचक कहा गया है।

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