साहित्य शास्त्र : आभिजात्यवाद, स्वच्छन्दतावाद और मार्क्सवाद पर संक्षिप्त टिप्पणी करें ।
आभिजात्यवाद मूलतः क्लास या वर्ग-विभाजन के इतिहास से सम्बद शब्द हैं ।

Chopta plus: अंग्रेजी में जिसे क्लासिसिज्म कहा जाता है. वही शास्त्र या श्रेण्यवाद हिंदी में आभिजात्यवाद के रूप में प्रचलित हो गया है। यद्यपि अंग्रेजी के क्लासिसिज्म के पर्यायरूप में प्रचलित हो आभिजात्य शब्द का प्रयोग पूर्णतः उचित नहीं है, इसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ भी क्लासीसिज्य के भाव को स्पष्ट करने में असमर्थ है.
किन्त अंग्रेजी में विगत 20000 वर्षों से जो क्लासिसिज्म की धारणा विकसित हई है, वह हिन्दी में आभिजात्य शब्द के प्रयोग और प्रचलन के कारण रूढ़ हो गई है।
आभिजात्यवाद का इतिहास
आभिजात्यवाद के प्रवर्तन का श्रेय अरस्तु के सिद्धान्तों के व्याख्याकार और चिन्तक होरेस को दिया जा सकता है जिन्होंने 65 ई. पू. में इस सिद्धान्त का प्रवर्तन किया। यद्यपि यह शास्त्रीवादी प्रवृत्ति चार सौ ईसा पूर्व में ही अरस्तु के शास्त्रीय चिन्तन में प्रवेश कर चुकी हैं।
यही नहीं, प्लेटो के काव्य-चिन्तन में भी इस सिद्धान्त के सूत्र स्पष्टतः देखे हैं। इस सिद्धान्त में सामान्यत भावोद्रेक के स्थान पर बुद्धि विवेक पर बल दिया गया हैं ।
कहा जाता है कि रोमांटिक कवियों ने लैटिन के आदर्श का अनुकरण नहीं किया, किन्तु यह तो सत्य है कि उन्होंने इन प्राचीन क्लासिक रचनाओं से प्रेरणा अवश्य लि हैं। तात्पर्य यह है कि क्लासिक या आभिजात्य या शास्त्रीय शब्द का प्रयोग किसी न किसी रूप में कालजयी कृत्यों द्वारा स्थापित आदर्श के अनुकरण के रूप में भी देखा जा सकता है। इन कवियों के आदर्श से आगे आने वाले कवि और साहित्यकार प्रेरणा ग्रहण करते रहेंगे ।
इस विवेचन का निष्कर्ष इस रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है-
(1) आभिजात्यवाद मूलतः क्लास या वर्ग-विभाजन के इतिहास से सम्बद शब्द हैं ।
(2) प्राचीन रोम रोम में पाठक वर्ग की सामाजिक बौद्धिक स्थिति को देखते हुए उस समय दो प्रकार को रचना की जा रही थी (क) अशिक्षित और कामकाजी निम्न वर्ग की जनता के लिए जन-साहित्य या लोक-साहित्य की रचना जो प्रारम्भिक अवस्था में था। (ख) स्क्रिप्टतर क्लासिक्स की रचना सुशिक्षित, उच्चवर्गीय, करदाता समाज के लिए जो रचनाएँ प्रस्तुत की गई। इस साहित्य को उच्च वर्ग का संरक्षण प्राप्त था।
यह साहित्य उच्च वर्ग की संस्कृति से सम्बद्ध, परिपूर शास्त्र-बद्ध था। इसीलिए इसे आभिजात्यवाद कहा जाता है। समाज की उच्च सम्बद्ध होने के कारण आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने इसे हिन्दी में श्रेण्यवाद है, जो प्रचलित नहीं हो सका और क्लासिसिज्म के पर्याय रूप में हिन्दी में आभिजात्यवाद या शास्त्रवाद शब्द का ही अधिक प्रचलन हो गया है।
(3) रोमान्टिसिज्म यानी स्वच्छन्दतावाद और क्लासिसिग्म यानी आभिजात्यवाद परस्पर दो भिन्न प्रवृत्तियों के वाचक हो गये जो कभी विरोधी बने तो कभी पूरक । स्वच्छन्दतावाद के कारण हो आभिजात्यवाद की विशेषताएँ प्रकट और निश्चित हुई ।
(4) स्वच्छन्दता के विरोधी विचारकों ने आभिजात्यवाद की विशेषताओं को रेखांकित किया।
(5) साहित्य और कला में आभिजात्यकार से तात्पर्य प्राचीन ग्रीस और रोम के साहित्य के प्रति निष्ठा से माना जाता है।