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जमीन उपजाऊ बनाने के लिए क्या करें : पैदावार बढ़ाने के लिए जरूरी उपाय

जैविक खाद मिट्टी में नमी बनाए रखती है और लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाती है।
 
उपजाऊ जमीन
हर सीजन में एक ही फसल बोने से जमीन कमजोर हो जाती है।

किसान की असली पूंजी उसकी जमीन और मेहनत होती है। अगर जमीन उपजाऊ (fertile) है तो पैदावार (pedawar) अपने आप बढ़ती है। लेकिन लगातार रसायनों के उपयोग, कम होती वर्षा और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट से खेती पर असर पड़ रहा है। ऐसे में हर किसान का सवाल होता है – जमीन उपजाऊ बनाने के लिए क्या करें?

इस आर्टिकल में हम खेती की पैदावार बढ़ाने और जमीन की उर्वरता बनाए रखने के लिए जरूरी उपाय जानेंगे।

1. मिट्टी की जांच (Soil Testing) करवाएं

सबसे पहला कदम है – मिट्टी परीक्षण (soil test)

मिट्टी में कौन-से पोषक तत्व कम हैं, यह जानने के लिए हर किसान को 2-3 साल में एक बार मिट्टी की जांच जरूर करवानी चाहिए।

इससे सही मात्रा में खाद और उर्वरक डालने में मदद मिलती है।

मिट्टी की pH वैल्यू, कार्बन कंटेंट और माइक्रोन्यूट्रिएंट की जानकारी मिलने से किसान सही फसल का चुनाव कर सकते हैं।


2. जैविक खाद का प्रयोग करें

रासायनिक उर्वरक से जमीन की उपजाऊ शक्ति धीरे-धीरे कम होती है। इसके बजाय किसान को जैविक खाद (Organic Manure) का प्रयोग करना चाहिए।

गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद (green manure) और फसल अवशेषों को खेत में मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।

जैविक खाद मिट्टी में नमी बनाए रखती है और लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाती है।

3. फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाएं

हर सीजन में एक ही फसल बोने से जमीन कमजोर हो जाती है।

किसान को चाहिए कि गेहूं-धान जैसे अनाज वाली फसल के बाद दलहनी फसल (चना, मूंग, अरहर) बोएं।

इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है और जमीन लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है।

4. ग्रीन मैन्योरिंग (Green Manuring)

हरी खाद उगाकर उसे खेत में मिलाना जमीन की उर्वरता बढ़ाने का एक पुराना और कारगर तरीका है।

ढैंचा, सन या मूंग जैसी फसलें उगाकर 45-50 दिन बाद खेत में जोत दी जाती हैं।

इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है।

5. सिंचाई का सही प्रबंधन

अधिक या कम पानी दोनों ही स्थितियां जमीन को नुकसान पहुंचाती हैं।

ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम अपनाने से पानी की बचत होती है और पौधों को जरूरत के अनुसार नमी मिलती है।

खेत की सिंचाई सुबह या शाम को करनी चाहिए ताकि पानी का वाष्पीकरण कम हो।

6. नीम की खली और बायोफर्टिलाइज़र का उपयोग

नीम की खली और नीम कोटेड यूरिया मिट्टी में कीट और रोगों को कम करता है।

बायोफर्टिलाइज़र (जैसे राइजोबियम, एजोस्पिरिलम, पीएसबी) मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं।

ये प्राकृतिक तरीके से पैदावार (pedawar) में वृद्धि करते हैं।

7. खेत की जुताई और मेड़बंदी

समय-समय पर खेत की गहरी जुताई करने से मिट्टी की ऊपरी परत ढीली होती है और हवा का संचार बेहतर होता है।

खेत की मेड़बंदी (bunding) करने से बारिश का पानी रुकता है और मिट्टी का कटाव नहीं होता।

इससे जमीन लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है।

8. फसल अवशेष और मल्चिंग

फसल कटाई के बाद बचा हुआ भूसा, पत्तियां और डंठल खेत में मिलाकर मिट्टी की जैविक शक्ति बढ़ाई जा सकती है।

मल्चिंग (mulching) करने से मिट्टी की नमी बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं।

9. सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति

कई बार किसान केवल यूरिया और डीएपी डालते हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं होता।

जिंक, आयरन, बोरॉन, कॉपर, मैग्नीशियम जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट भी जरूरी हैं।

इनकी कमी मिट्टी की उर्वरता और फसल की पैदावार दोनों को प्रभावित करती है।

संतुलित मात्रा में इनका छिड़काव करने से पैदावार कई गुना बढ़ सकती है।

10. आधुनिक तकनीक और कृषि सलाह

किसान को कृषि विभाग और कृषि विश्वविद्यालयों से समय-समय पर सलाह लेनी चाहिए।

नई तकनीक, बेहतर बीज और वैज्ञानिक तरीकों से खेती करने पर कम लागत में ज्यादा पैदावार मिलती है।

अगर किसान सही तरीके अपनाए तो जमीन की उर्वरता (soil fertility) हमेशा बनी रह सकती है।

मिट्टी की जांच, जैविक खाद, फसल चक्र, ग्रीन मैन्योरिंग और सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग करके पैदावार (pedawar) में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की जा सकती है।

 जमीन हमारी धरोहर है। अगर हम इसे सही तरीके से संजोकर रखेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी खेती फायदेमंद बनी रहेगी।

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