कृषि कानूनों की वापसी का क्रेडिट कांग्रेस को देने पर भड़के किसान, लघु सचिवालय पर फूंका हुड्डा का पुतला
सिरसा। कृषि कानूनों की वापसी का राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिशों पर किसानों का गुस्सा एक बार फिर भड़क उठा है। सोमवार को भारतीय किसान एकता (बीकेई) के बैनर तले सिरसा के लघु सचिवालय के बाहर सैकड़ों किसानों ने इकट्ठा होकर जोरदार प्रदर्शन किया और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा का पुतला फूंका।
किसानों में इस बात को लेकर भारी रोष है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी पार्टी को तीन काले कृषि कानूनों की वापसी का श्रेय दिया जा रहा है। प्रदर्शनकारी किसानों ने हुड्डा के इस बयान को सीधे तौर पर किसान आंदोलन और उसमें अपनी जान गंवाने वाले 750 शहीद किसानों का घोर अपमान बताया है।
प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए बीकेई के वरिष्ठ नेता लखविंद्र सिंह औलख ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों काले कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर के किसानों ने अपने दम पर ऐतिहासिक संघर्ष किया था। किसान दिल्ली की सीमाओं पर 378 दिनों तक सर्दी-गर्मी की परवाह किए बिना डटे रहे। हजारों किसानों पर झूठे मुकदमे दर्ज किए गए और लखीमपुर खीरी की सड़कें किसानों के खून से लाल हो गई थीं।

औलख ने याद दिलाया कि किसानों के लंबे संघर्ष और भारी जनदबाव के आगे झुकते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर देश से माफी मांगते हुए कानून वापस लिए थे। उन्होंने कहा कि अब कांग्रेस नेताओं द्वारा यह कहना कि कृषि कानून राहुल गांधी के कारण वापस हुए, पूरी तरह से झूठा और किसान संघर्ष का अपमान है। औलख ने सवाल उठाया कि यदि कांग्रेस ने ही कानून वापस करवाए थे, तो 13 महीने तक किसान सड़कों पर क्यों बैठे रहे और कांग्रेस नेता उनके साथ क्यों नहीं डटे।
किसान नेताओं ने स्पष्ट किया कि आंदोलन के दौरान किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेता को किसानों का मंच साझा करने की इजाजत नहीं दी गई थी। ऐसे में किसानों के बलिदान का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रदर्शनकारियों ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा से सार्वजनिक रूप से किसानों से माफी मांगने की मांग की है और चेतावनी दी है कि किसान समाज अपने शहीद साथियों का अपमान कभी स्वीकार नहीं करेगा।
इस दौरान कांग्रेस की पूर्व नीतियों पर भी तीखा प्रहार किया गया। लखविंद्र औलख ने गैट (GATT) और डब्ल्यूटीओ (WTO) समझौतों का जिक्र करते हुए कहा कि किसानों की बर्बादी की नींव कांग्रेस शासनकाल में ही रखी गई थी। वर्ष 1991-94 के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए और 1 जनवरी 1995 को भारत डब्ल्यूटीओ में शामिल हुआ, जिससे भारतीय कृषि क्षेत्र पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव बढ़ा। इसके बाद सत्ता में आई भाजपा सरकार ने भी किसानी सेक्टर को कॉरपोरेट के हाथों में सौंपने का काम किया।
भारतीय किसान एकता ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि किसान विरोधी नीतियों और किसान आंदोलन का अपमान करने वाले किसी भी नेता को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह किसी भी दल का हो। आज भी किसान एमएसपी की कानूनी गारंटी और कर्ज मुक्ति के लिए संघर्षरत हैं। इस रोष प्रदर्शन में बीकेई प्रदेश महासचिव अंग्रेज सिंह कोटली, गुरप्रीत संधू, गुरप्रीत जैलदार, जगतार बराड़, गुरजीत मान, नत्था सिंह झोरड़ रोही, विनोद मोड़ावाली, राजू सिंह, महावीर गुड़ियाखेड़ा, राकेश खारिया, गुरसेवक सिंह वीरूवाला और बलकार सिंह शिरा सिंह सहित कई किसान मौजूद रहे।
